कविता: स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं
स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं
दुकानों से कमीशन खाने लगे हैं
किताब, कॉपी, जूते, जुराब, बैग
यहां तक की ड्रेस भी बिकवाने लगे हैं
बच्चे को पढ़ाना संघर्ष हो गया है
रोज स्कूल की फीस बढ़ाने लगे हैं
स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं
अनुशासन अब मिलता नहीं देखने को
बच्चे आज के गुरु को आंख
दिखाने लगे हैं
तरह-तरह के चार्ज लगाने लगे हैं
एडमिशन फीस, हर साल बढ़ाने लगे हैं
बिल्डिंग फीस, ट्रांसपोर्ट फीस
जाने क्या-क्या लगाने लगे हैं
सिलेबस पूरा बस कराने लगे हैं
बच्चे पढ़े ना पढ़े, फेल हो या पास
अपनी जेबें भराने लगे हैं
स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं
आजकल तो होमवर्क करते हैं पैरेंट्स
बच्चे तो नखरे दिखाने लगे हैं
बोलना भले ही न आए ठीक से
अब तो ढाई साल के बच्चे भी
स्कूल जाने लगे हैं।
वो गुरु-शिष्य परंपरा तो
जाने कहां खो गई
अब तो बच्चे गुरु को
डराने लगे हैं।
स्कूल अब बाजार सजाने लगे हैं।
---dr वंदना शर्मा नई दिल्ली