कविता
काश उन लोगों में मेरे अपने ना होती
मैं लोगों को जानती हूं
इसलिए सवाल नहीं करती कि लोग इतने बुरे क्यों होते हैं
पर कभी-कभी सोचती हूं
काश उन लोगों में मेरे अपने ना होती
पर अफसोस यह सच है
हद से ज्यादा दुख दर्द अपने ही देते हैं
जिसे हम अपना कहते हैं
कभी-कभी वही सबसे ज्यादा कुड़ और निर्णय होते हैं
इतना की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता
चोट लगने के बाद थकने के बाद
हम हमेशा अपनों के छाया ढूंढते रहते हैं
उम्मीद करते रहते हैं
अपनों के सहारे की
पर कभी-कभी वह छाया देने वाले जगह ही
किल और नोकीलि पत्थर से बनी होती है
वह उम्मीद सहारे की मेहेश हमारे मन की कल्पना होते हैं सच्चाई बिल्कुल नहीं
सहारा तो मिलता है
पर उन में
इतनी नफरत इतनी ईर्शा होती है
की
कोई कभी सोच भी नहीं सकता
कि
सचमुच में वह अपने हैं
जिसके पास हम
हमेशा दिल टूटने के बाद दर्द होने के बाद लौटाना चाहते हैं
जैसे हम अपने कहते रहते हैं
क्या वह अपने हैं
जो इतना बुरा भी हो सकता है
और इतनी मतलबी भी
हंसते हुए चेहरे मीठी बातें
चेहरे देखकर बातें सुनकर
लगता नहीं की वह हमारे अपने हैं जिसके अंदर
हमारे लिए इतनी नफरत भरी हुई है
मैं आपकी प्रिय लेखक अभिनिशा❤️🦋💯