यादों को तस्सब्बुर में आने दो
फिर से गम को सजा पाने दो
भटका रहा हूँ कबसे इन गलियों में
अब राहें मुकम्मल हो जाने दो
फिर से गम को सजा पाने दो
कौन है हमदर्द भला किसी का यहाँ
यह भरम भी अब तोड़ आने दो
फिर से गम को सजा पाने दो
भर आया है आँखों में हर सय का अक्स कतिल
अब बनकर आंसू बूंद- बूंद बह जाने दो
फिर से गम को सजा पाने दो
बुझ रही है सांसे तो करे क्या जीने की ख्वाहिश
हो मिलन तुमसे बस ऐेसी तलब जागाने दो
फिर से गम को सजा पाने दो
✍️बेनी सागर