मैं भी बच्चा बन जाना चाहती हूं
कविता
थक गई हूं बचपन से ही बड़ी होते होते
मैं भी बच्चा बनना चाहती हूं
किसी की बाहों में आकर जी भर रोना चाहती हूं
बचपन से ही समझदार होते होते खो दी है
मैंने अपनी बचपन को
अब उस बचपन को मैं मिस कर रही हूं
कोई आए और लौटा दे मेरे बचपन को
मैं फिर से बच्ची बन जाना चाहती हूं
बिना सोचे बिना परवाह जीना चाहती हूं
मैं बच्चों की तरह बिना सोचे कुछ भी करना चाहती हूं
क्यूरोसिटी में बचपन की हर चीज को छुना चाहती हुं
मैं फिर से बच्ची बन जाना चाहती हूं
थक गई हूं बड़ी बहन होते-होते
थक गई हूं सब कुछ संभालते संभालते
अब छोटी बहन बन जाना चाहती हूं
मैं प्यारी सी बच्ची बन जाना चाहती हूं
जिसके पिता उसे प्यार करें
जिसको मां उसे दुलार करें
मैं वही बच्ची बन जाना चाहती हूं
मुझे गले लगा लो कोई
मैं किसी के बाहों में सो जाना चाहते हैं
हमेशा यह कहकर मुझको ना रुको कि
मैं बड़ी हूं
और मुझे समझदार होना चाहिए
अपनी छोटे भाई बहन के ख्याल रखना चाहिए
और साथ में घर को भी संभालना चाहिए
छोटो की प्रेरणा और बड़ों के सामने आदर्शवादी
मत डालो मुझ पर बहुत सारे बोझ जवाने भर के
मेरे कंधे कमजोर है
इतने सारे भार उठा ना पाएंगे
कभी यह भी कह दो छोड़ दो प्रवाह
छोड़ दो किसी दिन तुम्हारे वजह से बिगड़े हुए कामों को
और बस तुम छोटी सी बच्ची बन जाओ
और वही करो जो एक छोटे बच्चे करती है
मैं सचमुच में थक गई हूं
सबको संभालते हुए
बड़ी और समझदार होने की पहचान लिए
मुझे गले लगाओ मैं सोना चाहती
जी भर के अब रोना चाहती हुं