*काश हम रोक पाते*
काश हम रोक पाते
उम्र को बढ़ने से
जवानी को ढलने से
बुढ़ापे को चेहरे पे आने से
कितना मुश्किल होता है
स्वीकार करना बढ़ती उम्र को
चेहरे की झुर्रियों को
टूटते रिश्तों को,
दूर होते अपनों को
क्यों इतनी तेजी से बढ़ता समय
सबके चेहरे बेनकाब करता
आईना भी जब सवाल करता
है कौन मेरा अपना यहां
किसका हूं मैं इंतजार करता
बीतता समय जब डराने लगे
अपना चेहरा भी अनजाना लगे
आईना भी जब बेगाना लगे
दो शब्द प्रशंसा की चाह में
खोया ये सारा जमाना लगे
तब संभल जा ए दिल
सत्य को झुठला नहीं सकते
जिंदगी की सांसे भले कम हों
उन्हें रोकर यूं बिता नहीं सकते
प्रकृति से सीखो खिलना और मुरझाना
दो पल की जिंदगी, जग को महका जाना
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली