शब्दों को सींचा रात-दिन जग कर, नींद भी गिरवी रख दी,
दुनिया को अर्थ दिए, पर अपनी ही पीड़ा लिख दी।
स्याही में बहा पसीना, फिर भी जेबें खाली हैं,
तालियों में नाम नहीं, बस फ़ुटपाथों पर थाली हैं।
किताबें बिकीं बाज़ारों में, लेखक भूखा रह गया,
सम्मान के दो शब्दों को भी, वह तरसा-तरसा रह गया।
फिर भी कलम नहीं रुकती, यह प्रण है लेखकों का,
अंधेरे में दिया जलाना, धर्म है लेखकों का।
- Deepak Kumar Tiwari