💌Dil ka notification#11 –
शीर्षक : वो घर 🏡
आज कई सालों बाद...
उस घर का दरवाज़ा खोला,
जहाँ कभी मेरा बचपन रहा करता था।
सब कुछ वहीं रखा था...
बस, लौटने वाला इंसान बदल चुका था।
आँगन आज भी वैसा ही था,
दीवारों पर टंगी तस्वीरों पर बस धूल की परत चढ़ गई थी।
मगर बचपन की वो आवाज़ें...
आज भी हर कमरे में गूंज रही थीं।
रसोई से आती माँ की पुकार,
पापा की भारी आवाज़ में डाँट,
भाई-बहनों की वो नोकझोंक...
जैसे समय ने सब कुछ एक पुराने संदूक में सहेज रखा हो।
तब समझ आया...
घर ईंटों और दीवारों से नहीं बनता,
घर तो अपनों की साँसों से बसता है।
जब अपने ही दूर हो जाएँ...
मकान तो रह जाता है,
पर घर... कहीं खो जाता है।
❤️ धड़कते रहिए..
जिगर अशोक पंड्या.