अरे खुशियों से क्या आस लगाएँ,
वफ़ा का साथ तो ग़म निभा जाते हैं।
खुशियों के लिए तमन्ना की जाती है,
ग़म तो मुक़द्दर से चला आते हैं।
कौन कहता है कि खुशियों के लिए
हर दुआ कबूल हो जाती है,
हमसे पूछो...
ग़म तो बिना माँगे भी
झोली में आ जाते हैं।
फिर भी अजीब बात है,
इंसान हर बार खुशियों की ही दुआ करता है।