घर का बड़ा बेटा
आज घर में सब दुआओं में बैठे थे और बेसब्री से अमित के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे थे। इंतज़ार सिर्फ़ रिज़ल्ट का नहीं था—उम्मीदों का था, सपनों का था और अपने बोझ के थोड़ा कम हो जाने का था। पापा को इंतज़ार था कि अमित के रिज़ल्ट से उनके कंधों का थोड़ा बोझ कम हो जाएगा। माँ को इंतज़ार था कि वह सबसे कह सकेगी—उसका बेटा सरकारी अफसर बन गया। वहीं भाई-बहनों को इंतज़ार था कि अब वे बड़े शहर के अच्छे कॉलेज में पढ़ने जा सकेंगे।
वहीं अमित अपने कमरे में लेटा छत को एकटक देख रहा था। घड़ी की टिक-टिक के साथ उसके दिल की धड़कन भी बढ़ती जा रही थी। बाहर से आती घरवालों की आवाज़ें जैसे उसकी बेचैनी और बढ़ा रही थीं। वह किसी गहरी सोच में डूबता जा रहा था। अगर आज रिज़ल्ट उसके हक़ में नहीं आया तो वह क्या करेगा? सबको क्या जवाब देगा? एक पल को उसकी साँस जैसे गले में ही अटक गई। माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें तैर आईं। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को संभाला, लेकिन मन की चाल पर भला किसका बस होता है। करवट बदलते ही एक और ख्याल उसके मन में आ गया।
वह पापा का बोझ कैसे कम करेगा? माँ से कैसे नज़र मिलाएगा? छोटे भाई को पढ़ने के लिए बाहर भेजना है… और बहन की भी तो शादी की उम्र हो गई है। इन सबके बारे में सोचते हुए उसने एक लंबी साँस ली और आँखें बंद कर लीं। उसे याद आया, जब उसने बारहवीं में टॉप किया था, तब उसके पापा ने शर्मा अंकल से बड़े गर्व से कहा था— "अमित मेरा बोझ कम करेगा।" शर्मा अंकल भी मुस्कुराकर बोले थे— "अमित जैसा होनहार बेटा मिलना बड़ी किस्मत की बात है।" उन्हीं बातों को सोचते-सोचते न जाने कब उसकी आँख लग गई।
कुछ देर बाद माँ ने कमरे के दरवाज़े पर दस्तक दी। उसके साथ पापा, भाई और बहन भी थे। माँ ने अमित को प्यार से जगाया, उसका माथा चूमा और उसे सीने से लगा लिया। अमित कुछ समझ पाता, उससे पहले पापा अपनी आँखों की नमी छिपाते हुए बोले— "मुझे तो पता था… हमारा बेटा हमारा नाम ज़रूर रोशन करेगा।" अमित का रिज़ल्ट आ चुका था। वह सरकारी अफसर बन गया था। अमित कुछ पल तक अचंभित होकर सबको देखता रहा। जब बहन ने उसे हिलाकर बधाई दी, तब जाकर जैसे उसे होश आया। वह उठकर माँ-पापा के पैर छूने लगा।
अमित की जॉइनिंग हो गई। उसके दोस्तों ने शहर से काफी दूर पोस्टिंग ली थी, ताकि वे अपनी जिंदगी थोड़ा खुलकर जी सकें। मन तो अमित का भी था। दोस्तों की बातें सुनकर वह कुछ देर सोच में पड़ गया। लेकिन अगले ही पल उसके मन में उन खर्चों की उधेड़बुन शुरू हो गई, जो कभी उसके पापा किया करते थे। कौन देखेगा घर? माँ-पापा का खर्च कैसे चलेगा? भाई की पढ़ाई? बहन की शादी?
चेहरे पर एक अनजानी-सी मुस्कान लिए अमित ने कहा "मैं कुछ साल शहर के आसपास ही रहूँगा।" धीरे-धीरे अमित ने घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ अपने ऊपर ले लीं। छोटे भाई का अच्छे कॉलेज में दाखिला करवाया। बहन के लिए अच्छा-सा घर देखकर धूमधाम से उसकी शादी की। इन सबके बीच जब कभी माँ अमित से उसकी शादी की बात करती तो वह हँसकर टाल देता— "अभी उम्र ही क्या है मेरी… कर लूँगा।" लेकिन अमित के मन में कुछ और था। वह पहले अपने छोटे भाई को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता था।
एक रोज़ अमित अपने कमरे में कुछ कागज़ ढूँढ़ रहा था। किताबों के बीच से एक पुरानी बाइक की तस्वीर निकलकर नीचे गिर गई। वही बाइक, जिसे वह कभी खरीदना चाहता था। दोस्तों के साथ उसी बाइक पर घूमने और लंबी यात्राओं पर जाने के कितने सपने देखे थे उसने। तस्वीर को देखकर अमित के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई। उसने एक लंबी, ठंडी साँस ली। तभी पीछे से माँ की आवाज़ आई— "अमित…" माँ की आवाज़ सुनते ही अमित ने तस्वीर को वापस किताब के बीच रख दिया और कमरे से बाहर चला गया।
अमित अपनी ज़िम्मेदारियों से खुश था। उसे सुकून मिलता था कि उसके कारण घर की कोई चिंता थोड़ी कम हो जाती है। उसने कभी किसी से शिकायत नहीं की। बस अपनी मुस्कान के पीछे अपनी थकान छिपाना सीख लिया था।
एक शाम अमित ऑफिस से घर आया तो उसने अपनी बहन को देखा। मुस्कुराकर बोला— "गुड़िया, तुम कब आई?" बहन ने भाई के चेहरे की तरफ देखा। आज उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसका भाई कितना थक गया है। रात को खाना खाते समय अमित अपनी बहन के ससुराल का हाल-चाल पूछ रहा था। वह उसकी खुशियों और परेशानियों के बारे में जान लेना चाहता था। लेकिन बहन की नज़र बार-बार अपने भाई के चेहरे पर जा रही थी। उसे याद आने लगा— उसकी शादी में भाई ने कितनी मेहनत की थी। उसकी पसंद की हर चीज़ का ध्यान रखा था। माँ-पापा का कितना ख्याल रखता था। छोटे भाई का इतने बड़े शहर के अच्छे कॉलेज में दाखिला भी उसी ने करवाया था, जबकि पापा इतने खर्चे को लेकर परेशान थे। तब अमित ने ही पापा को समझाया था— "पापा, आप परेशान मत होइए… सब हो जाएगा।"
बहन की आँखों में नमी उतर आई। उसने बहुत धीरे से पूछा— "भैया… आप शादी कब करेंगे?" अमित ने एक पल उसकी तरफ देखा। फिर खाने की प्लेट में नज़र झुकाकर बोला— "कर लेंगे गुढ़िया… बस कुछ काम और पूरे कर लूँ।" फिर मुस्कुराते हुए बोला— "तुम इतना मत सोचो… तुम खुश रहो।" अमित की बात सुनकर जैसे उसकी बहन की साँस कुछ पल के लिए रुक गई। खाने की मेज़ पर अचानक एक ख़ामोशी उतर आई। वह चुपचाप अपने भाई को देखती रही। उसकी निगाहें अमित के थके हुए चेहरे और आँखों के नीचे उभरी हल्की-सी कालिख पर टिक गईं।
अमित ने उसकी तरफ देखा और हमेशा की तरह मुस्कुराकर पूछा— "क्या हुआ गुढ़िया?" वह कुछ नहीं बोली। बस उठी, उसके पास गई और हल्के से उसके कंधे पर हाथ रख दिया। अमित उसकी तरफ देखता रहा। वह कुछ कहे बिना वहाँ से चली गई। अमित ने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसके लिए शायद यह भी रोज़ की तरह ही एक शाम थी। लेकिन बहन के लिए वह शाम पहले जैसी नहीं थी। उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिस भाई से उसने हमेशा अपनी हर परेशानी बाँटी थी, उसने अपनी कोई परेशानी कभी किसी से बाँटी ही नहीं। वह सबके लिए खड़ा रहा और शायद इसी वजह से सबको लगा कि उसे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं।
उस रात घर में सब सो गए। लेकिन बहन की आँखों में नींद नहीं थी। उसे बार-बार अमित का वही जवाब याद आ रहा था"कर लेंगे बस कुछ काम और पूरे कर लूँ।" वह सोचती रही पता नहीं अमित की ज़िंदगी में अपने लिए जीने की बारी कब आएगी। और शायद पहली बार उसे यह समझ आया कि ज़िम्मेदारियाँ निभाते-निभाते इंसान हमेशा नहीं थकता, कभी-कभी वह बस थकने का हक़ खो देता है