जिम्मेदारी में पीछे छूटे वजूद
"यह कहानी किसी घर या किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उन अनकही भावनाओं का एक आईना है जो अक्सर रसोई की चारदीवारी में दब जाती हैं। इसका उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करना है।"
रश्मि सुबह से घर के काम में लगी हुई थी। कभी किचन से आती कुकर की सीटी पर वहाँ भागती, तो कभी कमरे में ऑफिस के लिए तैयार होते पति की आवाज़ पर उसके काम करने के लिए जाती। साथ में सास को दवाई देना और बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना—रश्मि, जो बस 30 साल की है, लेकिन जिम्मेदारियाँ उठाते-उठाते जैसे 50 साल की हो गई हो। उस घर के लिए रश्मि एक इंसान से ज़्यादा एक 'टाइम-मशीन' थी, जिसमें बस समय सेट कर दिया जाता था और फिर उसका इस्तेमाल करने वाले उसे भूल जाते थे।
आज छुट्टी का दिन था, घर में सुकून और शांति थी, लेकिन यह सब घर से बाहर जाने वालों के लिए था, रश्मि के लिए नहीं। रश्मि अपने तय समय के अनुसार उठकर किचन में सबके लिए नाश्ता बना रही थी। किचन से आती पराठों की खुशबू और चाय से अदरक की महक रश्मि के मन को सुकून दे रही थी। घर की स्त्रियाँ बहुत मन से सबके लिए खाना बनाती हैं, शायद उसमें वह प्यार भी घुल जाता है जो वे कह नहीं पातीं, और उसी में उन्हें खुशी भी मिलती है।
सुबह सब साथ में नाश्ता कर रहे थे। पति हाथ में अखबार लिए बैठा था। रश्मि, जो सबसे पहले उठी थी, बच्चों को नाश्ता करवा रही थी। नाश्ते की प्लेटों के टकराने की आवाज़ के बीच पति ने अखबार पलटते हुए खुशी से अपनी माँ से कहा, "माँ, आज-कल लड़कियाँ कहाँ से कहाँ जा रही हैं! देखिए, पेपर में एक लड़की के बारे में लिखा है जो कभी एक छोटे से गाँव से थी, आज वो बिज़नेस वूमन बन गई है।
यह सुनकर रश्मि जैसे और चुप हो गई। वह सोचने लगी, "मैंने भी M.Com किया है। क्या हो अगर मैं भी कोई बिज़नेस करना चाहूँ? क्या शादी से पहले या बाद में मैंने यह बात की होती, तो क्या ये भी वैसे ही खुश होते? क्या ये मेरी जिम्मेदारियों में हाथ बँटाते?"
तभी रश्मि का बेटा, जो आँगन में खेल रहा था, उसकी गेंद से सामने वाली खिड़की का काँच टूट गया। उस आवाज़ से रश्मि ख्यालों से बाहर आई। सास कुछ कहती, उससे पहले ही पति ने अखबार टेबल पर पटकते हुए कहा, "क्या यार रश्मि! तुम बच्चों पर ध्यान नहीं देती, मैं तो ऑफिस में व्यस्त रहता हूँ।"
रश्मि को यह बात सीधे दिल पर जा लगी। वह चाह कर भी कुछ न बोल पाई। अपनी जगह से उठी और टूटी हुई उम्मीदों के साथ टूटा हुआ काँच समेटने लगी, फिर किचन में बाकी काम निपटाने चली गई। सास यह सब देख रही थी, वह कुछ नहीं बोली, बस रश्मि को देखती रही।
शाम को जब सब चाय पी रहे थे और अपनी छुट्टी का आनंद ले रहे थे, रश्मि फिर शाम के खाने की तैयारी और बच्चों के काम में उलझी हुई थी। तभी सास ने चाय का कप रखते हुए बेटे से कहा, "बेटा, कल मैं रश्मि के साथ अपने मायके जा रही हूँ। शाम में आऊँगी। तुम बच्चों और घर का ख्याल रखना।
"यह सुनकर बेटा चौंक गया और कल के ढेर सारे कामों की लिस्ट गिनाते हुए बोला, "मैं नहीं देख पाऊँगा।" रश्मि ने सरलता से कहा, "नहीं माँ, आप चले जाइए, घर ये नहीं देख पाएंगे।" लेकिन सास अपनी ज़िद पर थी। आख़िरकार बेटे को उनकी बात माननी पड़ी।
रश्मि सुबह 3 बजे उठी और जल्दी-जल्दी दिन भर के सारे काम निपटा दिए—खाना, साफ़-सफाई, बच्चों के कपड़े, और फिर सास के साथ निकल गई। रश्मि उनके साथ तो गई, लेकिन उसका मन बच्चों में अटका रहा। शाम को जब दोनों घर आईं, तो घर का हाल देख रश्मि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पूरे घर में यहाँ-वहाँ खिलौने और अखबार फैले थे। यह देख सास हल्की सी मुस्कुरा दीं और बेटे ने रश्मि पर शिकायतों की झड़ी लगा दी।
रश्मि बिना कुछ बोले जल्दी-जल्दी सामान समेटने लगी। सास किचन से चाय बना लाईं और रश्मि को आवाज़ दी, "रश्मि, चाय पी ले, फिर करना।" यह सुनकर बेटा और भड़क गया और चिढ़कर बोला, "क्या माँ, आप देख नहीं रही हैं, मैं कितना परेशान हो गया हूँ!"
सास ने चाय का एक घूँट लिया, कप टेबल पर रखा और बेटे से बहुत प्यार से बोलीं, "बेटा, तुम एक दिन में परेशान हो गए? जिसे रश्मि सालों से बिना किसी शिकायत के कर रही है। आज भी वह सब काम करके गई थी, बस तुम्हें देखना था, जो तुम नहीं कर पाए। उस दिन तो तुम अखबार देखकर खुश हो रहे थे, क्या कभी रश्मि से पूछा कि वह घर के अलावा कुछ करना चाहती है या नहीं?"
बेटा चुप हो गया, जैसे उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा हो। सास आगे बढ़ीं और रश्मि के पास खड़े होकर बोलीं, "मेरी बहू ने भी M.Com किया है, लेकिन कभी उसने कोई शिकायत नहीं की, अपनी जिम्मेदारी मानी। क्या हो अगर कोई अपनी पहचान बनाना चाहे? जो तुम दूसरों की तारीफ करते हो, क्या कभी रश्मि का हाथ बँटा पाओगे?"
यह सुनकर रश्मि की आँखें भर आईं। सास ने रश्मि के कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्यार से कहा, "अगर मेरा सपना सिर्फ सीमित न होता, तो आज मैं तुम्हें अपने सपनों को मारने नहीं देती। मुझे माफ़ करना, रश्मि।"
एक एहसास
रश्मि की कहानी सिर्फ एक घर की नहीं, हर उस महिला की है जो अपनी डिग्री और सपनों को अलमारी में बंद कर चुकी है। याद रखिए, किसी का हाथ बँटाना 'मदद' नहीं, बल्कि 'जिम्मेदारी' है।
☆अनामकारा