एकांत के इस साये में,
हर कोई बदला-सा लगता है,
सब हैं मेरे आसपास,
फिर भी कोई अपना-सा नहीं लगता।
पास होकर भी सब दूर हैं,
या दूरियों में हम ख़ुद खो गए?
सब कुछ तो है इस ज़िंदगी में,
फिर क्यों हम ख़ुद से ही दूर हो गए?
मन के इस ख़ामोश कोने में,
कुछ है जो अच्छा नहीं लगता,
चेहरे पर सब ठीक है फिर भी,
मन पहले-सा क्यों नहीं लगता?
न जाने कहाँ खो गई वह मुस्कान,
जो कभी हमें सबसे प्यारी थी,
किस साये में गुम हुई वह,
जो कभी हमारे जीवन की ख़ुशहाली थी?
अब ख़ुद से ही सवाल है मेरा,
यह कैसा एकांत है छाया?
सब कुछ होकर भी कुछ नहीं लगता,
क्या मैंने ख़ुद को खोया,
या वक़्त ने मुझे मुझसे दूर बनाया?