हमारा बचपन
बचपन के लम्हे वक़्त मिटा नहीं पाता है,
गुज़रा हुआ हर दौर दिल में उतर जाता है।
मासूम हँसी, वो शरारतों का ज़माना,
दिल में महफ़ूज़ है बचपन का फ़साना।
वक़्त की रफ़्तार में उम्र गुज़र जाती है,
मगर बचपन की यादें कहाँ मिट पाती हैं।
किसी नन्हे की हँसी में ख़ुद को पाते हैं,
उसकी शरारतों में अपने दिन लौट आते हैं।
उसका रोना, उसकी हँसी, उसकी नादानी,
याद दिलाती है अपनी गुज़री ज़िंदगानी।
उसकी मासूमियत में अपना अक्स नज़र आता है,
दिल का ख़ामोश कोना फिर मुस्कुराता है।
लगता है, जैसे वक़्त पल भर को ठहर जाता है,
उस नन्हे के चेहरे में बचपन लौट आता है।
बचपन फ़क़त गुज़रा हुआ एक दौर नहीं,
इसकी यादों से दिल का कोई रिश्ता कमज़ोर नहीं।
उम्र बढ़ती है, बदलता है ज़िंदगी का कारवाँ,
मगर दिल में महफ़ूज़ रहता है बचपन का जहाँ।
वो नटखट अदाएँ, वो मासूम नादानियाँ,
यादों में आज भी ज़िंदा हैं बचपन की कहानियाँ।