Hindi Quote in Poem by Akanksha srivastava

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दिखती है गिनती जब बहुमत खामोश है
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आखिर क्यों अच्छाई पर बुराई भारी दिखाई जाती है,
आखिर क्यों इंसानियत पर गैरियत भारी दिखाई जाती है।
आज भी दुनिया जज्बातों से भरी पड़ी है,
फिर क्यों हर मोड़ पर बेमानी खड़ी है।
आज भी कितने बच्चे चैन त्याग जाते है,
पिता के सपनों को अपनी नींद बना जाते है।
माँ की उम्मीदों से भरे आँचल को अपने सर का ताज बनाते है।
खुद टूटकर भी घर का सपना साध जाते है,
फिर क्यों उन तमाम होनहारों के ऊपर छा जाते है कुछ गिनती के कुपुत्।
जहाँ आज भी सिरों पर, हज़ारों हाथों की छाया है,
और उन हाथों ने अपनत्व भी तो पाया है।
फिर क्यों प्रचारित होता है की वो महज एक लाचार छाया है।
जहाँ आज भी कई घरों में बड़ों से पुछकर पकवान पकते है।
फिर सिर्फ इसे क्यों प्रमुखता दी जाती की वे एक निवाले के लिए तरसते है।
जहाँ बड़ों ने खींची है, मर्यादा की रेखा,
जिसने पीढ़ियों को दिया ,सही राह को लेखा,
फिर क्यों नजर आते है कुछ अमर्यादित आचरण,
जो मिटा देते है संस्कारों का पावन आवरण,
जहाँ आज भी बड़ों के हक का आदर होता है।
संस्कारों से हर रिश्ता और गहरा होता है।
फिर क्यों दिखाये जाते है,
वो गिनती के बच्चे,
जो अवहेलना कर बड़ों के मान को कुचलते।
आखिर किसने हक दिया ,
हमारे अंकुरित होते बीज़ों के मानस पटल पर,
ये गंदगी बिखरने की, नहीं इज़ाज़त होनी चाहिए,
किसी को उस कच्चे मिट्टी के आकारों को बिगाड़ने की।

Hindi Poem by Akanksha srivastava : 112013460
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