कविता: क्षितिज
उस क्षितिज के पीछे तुम्हारी आँखें उभरती हैं,
गहरे नीरव समुंदर में सुनहरी यादें तरलीत हैं।
शाम ने तुम्हारे पलक पोंछ कर सूरज को चूम लिया,
और एक अकेला आँसू सागर की तरफ़ चल दिया। 😢
नीला आसमान भी ठहर सा गया, सांसें छीनती गई,
तुम्हारी नज़रों में डूबते , छलकते हर आंसे टिकती हुईं।
लहरों पर टिके हुए मीठे वादों के टुकड़े बिखरते हुए,
पुराने कल की ख़ामोशी में नव गीत अब सुनते हुए।
हर सूरज उतरते ही कुछ मिसालें चमक बन जाती हैं,
तुम्हारी आँखे, आँचल में ढले हुए सितारे मील जाती हैं।
धुंधली सी परछाई सी छिपती है चेहरे के किनारों पर,
और मैं गिनता हूँ उन लम्हों को जो तुमसे गुज़रे हारों पर।
चाहत की लहरों ने किनारे पर ख़ामोशी लिख दी,
शब्द टूटे पर एहसासों ने फिर मुस्कान की इबादत खड़ी की।
रात की चादर जब पानी पर धीरे-धीरे चलती है,
सूरज के पीछे से जैसे छाया और रौशनी मचलती है।
आँसू बनकर सूरज समुन्दर में गिरता है मगर जलता नहीं,
वह ताप और याद दोनों का संगम है — संभलता तो है मगर मुश्किल नहीं।
पर हर सुबह की किरण ये सिखाती है फिर से उठना,
क्योंकि किनारा इंतज़ार करती है, और आँखें फिर से देखना। 🌅