कविता: तुम होती
"काश तुम होती, मुझे समझ पाती,
मेरी खामोशी को पढ़ लेती।
काश तुम होती, मुझसे कहती,
दिल की बातों को नजर से सुनती।
मेरे बारे में थोड़ा जान लेती,
मेरी पीड़ा को पहचान लेती।
तुम तो समय हो, बहते हुए मिले ,
तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, रुके या चले।
मैं तुम्हारे पीछे दौड़ रहा हूँ,
हर दिन खुद को भुला रहा हूँ।
अगर कभी तुम मेरे पीछे आती,
तो मेरी थकान मिट जाती।
यही है भाग-दौड़ का जीवन,
हर चेहरे के पीछे छिपा है एक सावन।
भीड़ में रहकर भी मैं तन्हा हूँ,
अपने ही साए से अनजान हूँ।
यार, मैं सच में अकेला हूँ,
बिना आवाज़ का सवाल हूँ।
कोई बस एक बार पूछे,
“कैसे हो?” — मन कहता है बहुत अच्छे ।"
पल्लव सान्याल