"किरदार: नया दौर, वही जज़्बात"
मैं वो पन्ना हूँ जिसे वक़्त ने मोड़ा बहुत है,
पर मेरी स्याही ने तूफानों का रुख मरोड़ा बहुत है।
लोग कहते हैं ज़माना अब 'डिजिटल' हो गया है,
पर इस रूह ने आज भी सादगी से नाता जोड़ा बहुत है।
मेरी ख़ामोशी को मेरी कमज़ोरी मत समझना,
ये वो आग है जो शांत रहकर भी दहकती है।
इश्क़ हो या इरादा, मैं आधा नहीं रखता,
मेरी हर धड़कन अब बेख़ौफ़ होकर धकती है।
तुम मुझे ढूंढोगे महफ़िलों के शोर-शराबे में,
मैं मिलूँगा तुम्हें अपनी तन्हाई के रुतबे में।
न हार का डर है, न जीत का गुमान,
मैं उड़ रहा हूँ अब अपने ही खुले आसमान में।
ये जो 'ट्रेंड' है, ये तो आता-जाता रहेगा,
पर मेरा अंदाज़ सदियों तक याद किया जाएगा।
क्योंकि मैं सिर्फ़ शब्दों का जादूगर नहीं,
मैं वो हूँ जो पत्थर को भी अहसास पिला जाएगा।