एक धुंधला-सा पल,
जिसमें कुछ धुंधली यादें।
उन्हीं धुंधले लम्हों में
आँखों से एक अश्रु बह जाता है,
और बह जाती हैं
उसके साथ अनंत स्मृतियाँ।
अहसास होता है
इस अनंत ब्रह्मांड में
मैं नितांत अकेली खड़ी हूँ,
एक छोर पर कुछ स्मृतियाँ लिए।
जिस छोर की दूसरी ओर है
अनंत हर्ष, आह्लाद और सौंदर्य,
फिर भी मैं खड़ी हूँ
वही छोर थामे,
उन्हीं मीठी स्मृतियों की
एक नाज़ुक-सी डोर थामे
और पुनः आँखों से
बह उठती है
एक अनंत अश्रुधार।