वो मेरे थे- ये गुरूर की बात थी, उसने अपना समझा - ये दिल मंजूर की बात थी।
क्या शिकवा करता मैं भी इश्क़ में उनसे, उन्हें मनाना तो जैसे हजूर की बात थी।
"सुख" महफ़िलों में आज भी चर्चे हैं उनके जुबाँ पर, हद से बढ़कर इश्क़ के सुरूर की बात थी।
रह गए कुछ पन्ने अब भी मेरी डायरी में खाली, जो लिखा नहीं गया वही ज़रूर की बात थी।
वो मेरे थे- ये गुरूर की बात थी,