बत्ती जैसे हरी हुई और वो बस गुज़र गई,
खुशियाँ जैसे रुकी ही थीं, पल में न जाने किधर गई।
सी कर एक-सा किया ही था ज़िंदगी को,
कि थोड़ी सी खींचा-तानी में फिर से उधड़ गई।
रोटी, ज़िम्मेदारियाँ, सपनों और अपनों के बीच बँटा रहा मैं,
एक चीज़ संभाली तो दूसरी फिसल गई।
@Man_Ka_Zharonkha