बाग में मोर नाचा, सबने देखा
मोर ने अपने पैरों को देखा
एक टीस उभरी जैसे चाँद में दाग
क्यूँ नहीं किसी ने मेरा दर्द देखा
पंख मेरे अनन्य सुन्दर
पैर मेरे क्यूँ कुरूप फिर
चिढ़ाए मोरनी मुझको क्यूँ
कैसा है ये कुदरत का लेखा
सावन में जब बरसे पानी
कुदरत भी झूमे बन दीवानी
आ जाता मेरी आँख से पानी
क्यूँ रह जाता एक काश किसी कहानी में
अपूर्णता ही बने सुन्दरता सबकी कहानी में
कहे मोरनी मुझको देखो
मैं सुंदर पर सुंदर पंख नहीं है मेरे पास
अनदेखा कर अपनी कमी
पोंछ आँखों की नमी
छुओ आसमान पर ना छुटे जमीं
तेरी-मेरी नहीं सबकी यही कहानी
थोड़ी खट्टी थोड़ी मीठी जिंदगी सयानी
ईश्वर का वरदान है जिंदगानी
सुंदर गुलाब सबने देखा
संग काँटों का हमेशा ना देखा
बारिश में मोर नाचा सबने देखा
सुख दुख तो है विधि का लेखा
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*डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi