"साथ क्यों चाहिए?"
चुपचाप बैठी थी,
तभी मन में एक बात आई...
मैंने ख़ुद से पूछा
यार, ये 'साथ' इतना ज़रूरी क्यों होता है?
सुबह को सूरज का साथ चाहिए,
वरना दिन ही नहीं चढ़ता।
रात को चाँद का साथ चाहिए,
वरना अँधेरा अच्छा नहीं लगता।
बारिश को बादल चाहिए,
वरना वो गिरेगी कहाँ?
दिल को धड़कन चाहिए,
वरना वो जिएगा किसके लिए?
हमेशा से सुना है
"अकेले आए हो, अकेले जाना है।
यहाँ कोई किसी का नहीं होता।"
फिर भी क्यों?
जब हम रोते हैं,
तो कंधा ढूँढते हैं।
जब हम डरते हैं,
तो हाथ पकड़ना चाहते हैं।
शायद इसलिए...
कि अकेले तो बस
हम साँस लेते हैं।
साथ में ही हम
सच में जीते हैं।
सूरज भी अकेला नहीं रहता,
उसे आसमान चाहिए।
चाँद भी अकेला नहीं रहता,
उसे तारे चाहिए।
हम भी अकेले आए ज़रूर,
पर इंसान बनने के लिए
हमें एक-दूसरे का साथ चाहिए।
क्योंकि अकेले तो बस
दिन कट जाते हैं...
साथ में ही
यादें बन जाती हैं।
तो हाँ,
साथ ज़रूरी है
उतना ही,
जितना जीने के लिए
धड़कन।
प्राची तंवर …..