" सुकून की तलाश "
कितने साल बीत गये ए दोस्तों, हमारी बात नहीं हो रही।
जब सजती थी हमारी भी महफिलें वो रात नहीं हो रही।
आज फिर से बचपन जीने की हो रही है तमन्ना दिल में,
पर क्या करें दोस्तों? आप से ही मुलाकात नहीं हो रही।
खो गइ कागज़ की कश्ती, थम गया अब बारिश का पानी,
जो भीगा सके इकठ्ठा हमें ऐसी अब बरसात नहीं हो रही।
कहा था सबने कि जुदा होकर भी मिलेंगे हर मोड़ पर,
मगर मिल सके एक दुसरे से वो इनायत नहीं हो रही।
कमा तो रहे हैं हम सब यहाँ शौहरत और पैसा, ए दोस्त,
मगर जो सुकून दे जाए दिलको वो खैरात नहीं हो रही।
मोबाइल की स्क्रीन पर अक्सर मिलने लगें हैं हम सब,
मगर गले लगकर जो हंस लें, वो कायनात नहीं हो रही।
चाय की वो टपरी आज भी हमारा इंतज़ार करती है,
मगर जहाँ ठहाके गूंजते थे, वो शुरुआत नहीं हो रही।
"व्योम" तन्हाई में अक्सर गुज़रने लगी हैं अब तो रातें,
जो सुबह सुकून देती थी, अब वो सौगात नहीं हो रही।
✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી), મુ. રાપર