English Quote in Motivational by Raju kumar Chaudhary

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मेरी भाभी नहीं, मेरी माँ

Episode 5: भाभी की किताबें और सुमित का पहला बलिदान

सुबह के करीब छह बज रहे थे।

सूरज की हल्की रोशनी छोटे-से घर की खिड़की से अंदर आ रही थी।

सावित्री जमीन पर बैठी अपनी पुरानी मेडिकल की किताबें खोलकर पढ़ रही थी।

किताबें पुरानी थीं, कुछ पन्ने फटे हुए थे, लेकिन उसकी आँखों में एक नई चमक थी।

कई महीनों बाद उसने फिर अपने सपने को हाथ में पकड़ा था।

वह किताब के एक पन्ने पर लिखे शब्दों को ध्यान से पढ़ रही थी।

तभी दरवाजे के पास सुमित दिखाई दिया।

उसने मुस्कुराकर पूछा—

“भाभी, सुबह-सुबह पढ़ाई शुरू?”

सावित्री ने किताब बंद नहीं की।

“हाँ। अगर डॉक्टर बनना है तो मेहनत करनी पड़ेगी।”

सुमित ने कहा—

“यही तो मैं सुनना चाहता था।”

सावित्री मुस्कुराई।

“लेकिन एक समस्या है।”

“क्या?”

“मेरी सारी किताबें पुरानी हैं। बहुत-सी जरूरी किताबें मेरे पास हैं ही नहीं।”

सुमित ने सहजता से कहा—

“तो नई किताबें ले आएँगे।”

सावित्री ने तुरंत कहा—

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि अभी घर चलाना जरूरी है।”

सुमित ने जवाब नहीं दिया।

वह जानता था कि बात सिर्फ किताबों की नहीं थी।

सावित्री के डॉक्टर बनने के रास्ते में फीस, किताबें, परीक्षा और आगे की पढ़ाई—सब कुछ था।

और उसकी अपनी नौकरी की कमाई बहुत कम थी।

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गोदाम की नौकरी

सुमित जल्दी से तैयार होकर काम पर निकल गया।

जिस गोदाम में वह काम करता था, वहाँ दिनभर सामान उठाना, गिनना और व्यवस्थित करना पड़ता था।

काम कठिन था।

लेकिन सुमित शिकायत नहीं करता था।

गोदाम का मालिक विनोद नाम का एक मध्यम उम्र का आदमी था।

विनोद ने सुमित को काम करते हुए देखा और कहा—

“तुम बहुत मेहनती लड़के हो।”

सुमित ने कहा—

“काम मिला है तो मेहनत तो करनी ही है।”

विनोद ने पूछा—

“घर में कौन-कौन है?”

सुमित कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“मैं और मेरी भाभी।”

“माता-पिता?”

“नहीं।”

विनोद ने ज्यादा सवाल नहीं किया।

लेकिन उसने महसूस किया कि सुमित अपने बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहता।

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पहली तनख्वाह

एक महीने की मेहनत के बाद सुमित को पहली तनख्वाह मिली।

उसने पैसे हाथ में लिए तो कुछ पल उन्हें देखता रहा।

उसके मन में कई जरूरतें थीं।

घर का किराया।

राशन।

दवाइयाँ।

और सावित्री की पढ़ाई।

वह बाजार गया।

उसने राशन खरीदा।

दवाइयाँ खरीदीं।

फिर एक मेडिकल स्टोर के सामने रुक गया।

दुकान के बाहर मेडिकल की किताबों का एक छोटा-सा स्टॉल लगा था।

सुमित ने किताबों को देखा।

उसने दुकानदार से पूछा—

“यह किताब कितने की है?”

दुकानदार ने कीमत बताई।

सुमित ने जेब में रखे पैसे गिने।

किताब खरीदने के बाद उसके पास घर के बाकी खर्च के लिए बहुत कम पैसे बचते।

वह कुछ देर सोचता रहा।

फिर उसने किताब खरीद ली।

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घर वापसी

शाम को सुमित घर पहुँचा।

सावित्री ने पूछा—

“आज बहुत देर हो गई?”

“काम ज्यादा था।”

सुमित ने बैग आगे बढ़ाया।

“यह आपके लिए।”

सावित्री ने बैग खोला।

अंदर नई मेडिकल की किताब थी।

उसकी आँखें भर आईं।

“सुमित... यह कितने की है?”

“उसकी कीमत मत पूछिए।”

“लेकिन पैसे?”

“मैंने संभाल लिया।”

सावित्री समझ गई कि बात इतनी आसान नहीं थी।

उसने किताब वापस करने की कोशिश की।

“इसे वापस कर दो।”

सुमित ने किताब उसके हाथ में वापस रख दी।

“नहीं।”

“सुमित...”

“भाभी, जब आपने कहा था कि डॉक्टर बनना चाहती हैं, तभी मैंने फैसला कर लिया था।”

“लेकिन घर का खर्च?”

“मैं संभाल लूँगा।”

“अगर पैसे कम पड़ गए तो?”

सुमित मुस्कुराया।

“तो मैं थोड़ा और काम करूँगा।”

सावित्री ने कहा—

“तुम अपनी सेहत खराब कर लोगे।”

सुमित ने हँसते हुए कहा—

“आप डॉक्टर बन जाएँगी तो मेरी सेहत भी ठीक कर देंगी।”

सावित्री हँस पड़ी।

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पहला बलिदान

अगले दिन सुमित के पास घर का किराया देने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे।

मकान मालिक दरवाजे पर आया।

“सुमित, किराया कब दोगे?”

सुमित ने कहा—

“दो दिन का समय दे दीजिए।”

मकान मालिक ने पूछा—

“पैसे कहाँ गए?”

सुमित ने चुपचाप सावित्री की किताबों की तरफ देखा।

मकान मालिक समझ गया कि उसने कुछ खर्च किया है।

“ठीक है। दो दिन में दे देना।”

मकान मालिक चला गया।

सुमित अंदर आया।

सावित्री ने सब सुन लिया था।

उसने कहा—

“तुमने किराया रोककर मेरी किताब खरीदी?”

सुमित चुप रहा।

सावित्री की आँखों में आँसू आ गए।

“तुम ऐसा क्यों करते हो?”

सुमित ने कहा—

“क्योंकि यह सिर्फ आपकी किताब नहीं है।”

“तो?”

“यह हमारे भविष्य की किताब है।”

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सावित्री का संकल्प

उस रात सावित्री देर तक पढ़ती रही।

सुमित सो चुका था।

सावित्री ने किताब बंद की और सुमित की ओर देखा।

वह थककर सो रहा था।

उसने धीरे से कहा—

“मैं तुम्हारी मेहनत बेकार नहीं जाने दूँगी।”

उसने मन ही मन प्रण लिया—

“मैं डॉक्टर बनूँगी। चाहे मुझे कितनी भी कठिनाई क्यों न सहनी पड़े।”

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एक नया रास्ता

कुछ दिनों बाद सावित्री को पता चला कि मेडिकल की पढ़ाई के लिए उसे एक प्रवेश परीक्षा देनी होगी।

उसने फॉर्म देखा।

फीस देखकर वह परेशान हो गई।

उसने कागज सुमित के सामने रख दिया।

“इतने पैसे चाहिए।”

सुमित ने रकम देखी।

वह चुप हो गया।

यह रकम उसकी कई महीनों की बचत के बराबर थी।

सावित्री ने कहा—

“कोई बात नहीं। अभी नहीं तो बाद में।”

सुमित ने पूछा—

“फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख कब है?”

“सिर्फ दस दिन।”

सुमित ने कागज उठा लिया।

“फॉर्म भरेगा।”

“लेकिन पैसे?”

“मैं लाऊँगा।”

“कहाँ से?”

सुमित ने कहा—

“यह मेरी समस्या है।”

सावित्री ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं। तुम्हारी जिंदगी बर्बाद करके मैं डॉक्टर नहीं बनना चाहती।”

सुमित ने उसकी आँखों में देखकर कहा—

“आपकी जिंदगी बचाने के लिए नहीं, आपका सपना बचाने के लिए मेहनत कर रहा हूँ।”

सावित्री कुछ बोल नहीं पाई।

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रात का फैसला

उस रात सुमित बहुत देर तक जागता रहा।

उसने कागज पर अपनी कमाई और खर्च का हिसाब लगाया।

पैसे कम थे।

बहुत कम।

अचानक उसे एक विचार आया।

वह सुबह विनोद के पास गया।

“मालिक, क्या मैं सुबह की शिफ्ट के बाद रात में भी काम कर सकता हूँ?”

विनोद ने हैरानी से पूछा—

“तुम रात में भी?”

“हाँ।”

“इतना काम क्यों करना चाहते हो?”

सुमित ने कहा—

“मेरी भाभी पढ़ाई कर रही हैं।”

विनोद ने पूछा—

“तुम्हारी भाभी?”

“हाँ।”

“उनके लिए इतना?”

सुमित ने मुस्कुराकर कहा—

“वह मेरे भाई की पत्नी हैं। मेरे लिए माँ जैसी हैं।”

विनोद कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर बोला—

“ठीक है। रात की शिफ्ट भी कर लेना।”

सुमित ने राहत की साँस ली।

लेकिन उसे नहीं पता था कि लगातार दिन-रात काम करने की कीमत उसकी सेहत को चुकानी पड़ेगी।

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उसी रात...

सुमित घर लौटा तो बहुत थका हुआ था।

सावित्री पढ़ रही थी।

उसने पूछा—

“आज बहुत थके हुए लग रहे हो।”

सुमित ने मुस्कुराकर कहा—

“कुछ नहीं।”

वह बैठा ही था कि अचानक उसके सिर में तेज चक्कर आया।

उसने दीवार का सहारा लिया।

सावित्री घबरा गई।

“सुमित!”

सुमित ने खुद को संभाल लिया।

“मैं ठीक हूँ।”

लेकिन सावित्री ने उसकी आँखों में कमजोरी देख ली थी।

उसने गंभीर आवाज में कहा—

“तुम्हें डॉक्टर के पास जाना होगा।”

सुमित हँसते हुए बोला—

“अभी डॉक्टर कहाँ है?”

सावित्री ने उसकी ओर देखा।

फिर अपनी मेडिकल की किताब उठाई।

“बहुत जल्दी होगी।”

दोनों मुस्कुरा दिए।

लेकिन उस मुस्कान के पीछे आने वाले दिनों का एक बड़ा संघर्ष छिपा था।

क्योंकि सावित्री के प्रवेश परीक्षा के फॉर्म की आखिरी तारीख अब केवल तीन दिन दूर थी...

और सुमित के पास अभी भी पूरी फीस नहीं थी।

जारी रहेगा...

अगला एपिसोड:

Episode 6 — “तीन दिन, एक सपना और सुमित की सबसे बड़ी परीक्षा

English Motivational by Raju kumar Chaudhary : 112033720
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