ग़ज़ल
बहुत ख़ूबसूरत है अंदाज़ इल्ज़ाम लगाने का,
काश, यही भरम मेरी अंजुमन में भी होता।
हम भी बूँद-बूँद बनकर बरस जाते उन पर,
काश, एक ज़रा-सा ख़याल मेरा भी होता।
वो हर बार मेरी ख़ामोशियाँ पढ़ तो लेते हैं,
काश, उन्हें मेरी तड़प का भी इल्म होता।
मैंने हर मोड़ पर वफ़ा की शमा जलाई थी,
काश, उनके दिल में भी कोई उजाला होता।
मेरे हिस्से में तन्हाइयाँ ही तन्हाइयाँ आईं,
काश, उनकी दुआओँ में मेरा नाम भी होता।
मैंने हर ज़ख़्म को मुस्कुराकर छुपा लिया,
काश, उनकी निगाहों में मेरा दर्द भी होता।
अब न शिकवा है, न कोई गिला ज़िंदगी से,
काश, एक पल को ही सही, वो मेरा भी होता।
'बेनी' लिखता रहा दर्द को अशआर बनाकर,
काश, कभी उनकी ग़ज़ल का मैं भी हिस्सा होता।
✍️बेनी सागर