“मैं बड़ी कब हो गई?”
पता ही नहीं चला…
कब बचपन की वो छोटी-सी लड़की
सबकी नज़रों में “बड़ी” हो गई।
शायद उस दिन,
जब मैंने रोने से पहले ये सोचना सीख लिया
कि मेरे रोने से घर में किसी को परेशानी तो नहीं होगी।
शायद उस दिन,
जब अपनी पसंद से पहले
दूसरों की ज़रूरतें समझने लगी।
शायद उस दिन,
जब लोगों ने कहना शुरू किया—
“तुम तो समझदार हो, तुम संभाल लोगी।”
और मैं हर बार मुस्कुरा दी…
क्योंकि किसी ने पूछा ही नहीं
कि मैं संभालना चाहती भी हूँ या नहीं।
दूसरों की नज़रों में मैं कब बड़ी हुई,
ये आज तक समझ नहीं आया…
बस इतना पता है—
जिस उम्र में मुझे किसी का हाथ पकड़कर चलना था,
उस उम्र में मैंने खुद अपने कदम संभालना सीख लिया।
और शायद यही वजह है…
कि आज भी कभी-कभी
दिल करता है कोई प्यार से कहे—
“तुम बड़ी नहीं हुई हो…
आज भी हमारी छोटी-सी बच्ची हो।” 🥺❤️
#bydiksha