"…नहीं सुनती हो ना..."
सुनो...
इश्क बेपनाह है तुमसे
अपने होने का अहसास तक खो जाता हु
जब काले लहराते जंगल की गुत्थी सुलझाने
लग जाता हु
नहीं सुनती तुम
शर्मा के चेहरे पे हथेलियां रख देती हो
हाथों के उन मुलायम स्पर्श भरे तलुवु से
मुझे न जाने कितनी जलन महसूस होती है
सच में
रस्सी पर सूखते
पीले, लाल, गेरूए,
कपड़ो को,
या चूड़ियों की खनक को भी
मैं अपना रकीब समझ लेता हु
वे भी तो छू पाते है तुम्हें
जिसकी कल्पना में मैं डूब के पार हो जाता हु।
सुनती कहां हो तुम
मेरे रकीब न जाने कितने
देखो हंसों मत
कसम से कहता हु
उन रकीबी के नाम मैं सहता हु
ये बहती हवा
जो तुम्हें सुकून सा देती है
रकीब है मेरी,
आसपास फैली हरी घास
अपनी रकीबियत दिखाती हैं मुझे
क्या वे भी मुझसे उतनी ही ईर्ष्या करती होगी
जितनी मैं उससे करता हु,
जब मैं तुम्हारे केसों के वन में अपना रास्ता भूल जाता हु।
सुना न तुमने
अब छोड़ो मुझे ये बाल संवारने है
वही इश्क बेपनाह करते हुए
न जाने कितने जन्म आगे
लेने या अब मरने है
रात में बाल्कनी में आ जाना तुम
हिर की तरह न छोड़ जाना तुम
काजी क्या ही बिगाड़ लेगा
लेकिन एक दिन सबको पता चल ही जाएगा
की तुम सुनती नहीं हो
की मैं इश्क बेपनाह करता हु तुमसे
की इंतजार अब भी बाकी है
अब छोड़ो मुझे सवार दी है चोटी तुम्हारी
अपने हिस्से का उजास देकर
छिन लिया है इस जंगल का अंधकार
पक्का सुन लिया तुमने
और समझ भी गई तुम कि,
अब देर नहीं होगी
जाता हु मैं, बाल्कनी में राह तकना मेरी
जाना ही होगा मुझे
मेरा रकीब जो आता होगा।