अंगारों का पथ”
तूफानों से आँख मिलाकर जो आगे बढ़ जाते हैं,
वही समय के पन्नों पर इतिहास लिख जाते हैं।
जिसके भीतर ज्वाला हो, उसको कौन दबाएगा,
लोहे जैसा अटल इरादा पर्वत भी झुकाएगा।
मत डर रण की गर्जन से, मत रुक काँटों की मार से,
वीर वही जो लड़ता जाए अपने सत्य-विचार से।
रात अगर लम्बी हो तो सूरज भी निकलेगा,
मेहनत का हर एक पसीना मोती बन चमकेगा।
जो अन्याय के आगे चुप रहकर सिर झुकाते हैं,
वे जीते तो दिखते हैं पर भीतर मर जाते हैं।
उठ युवक! अपनी शक्ति पहचान, समय पुकार रहा,
तेरे साहस का दीपक ही अंधकार हार रहा।
धरती तेरे कदमों की आहट सुनना चाहती है,
भारत फिर से वीरों की गाथा गाना चाहती है।
सिंहासन खुद हिल उठते हैं जब जनता हुंकार करे,
सोया हुआ लहू भी फिर अंगारों सा प्रहार करे।
मत पूछ समय से कितना और इम्तिहान बाकी है,
तेरे भीतर जिंदा अब भी विजय का अभिमान बाकी है।
जिसने तपकर दर्द सहा, वही कुंदन कहलाता है,
संघर्षों की भट्ठी में ही वीर पुरुष बन पाता है।
उठ, अपनी आवाज़ बना तू बिजली की ललकारों को,
चीर दे अंधियारे सारे अपने तेज़ विचारों से।
कदम बढ़ा तो राह स्वयं मंज़िल तक ले जाएगी,
तेरी मेहनत एक दिन दुनिया को झुकवाएगी।