नही स्नेह अब बातों में,
पहचान नहीं किन्हीं आँखों में।
अपनत्व नहीं अब दिखता है,
हर शक्स अजनबी लगता है।
समझदार बन बैठेे हैं ,
रहा प्रेम का अर्थ नहीं।
पहले जैसे श्नेह देने मे ,
प्राणी अब समर्थ नही।
जिसने गैरो को अपनाया था ,
नित नित प्रेम लुटाया था।
चाची ,भैया ,माई ,कह कर बस रिश्ते बन जाते थे,
अपने ना होकर भी जो अपनो सा प्रेम जताते थे।
रही ना अब वो बात कहीं,
लगता अब ना देश वही
prachi....
- Prachi Pandey