मैं और मेरे अह्सास
बहार के दिन है
बहार के दिन है खुशियाँ दस्तक दे रही हैं l
धडकनों में भी गलियाँ दस्तक दे रही हैं ll
दिन पे दिन गुज़रते जा रहे हैं देखे बिना l
मुलाकात की चिट्ठियां दस्तक दे रही हैं ll
मँजे शायरों की महफिल में नशीली अच्छी l
शेर ओ शायरी में पंक्तियां दस्तक दे रही हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह