English Quote in Poem by Shivam Dhuriya

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तिमिरांचल को चीर क्षितिज पर, जब सोने का रथ आता है,
सुप्त धरा के कतरे-कतरे में नया प्राण भर जाता है।
निशि की नीरवता पर जो अपनी रश्मियों की तान छेड़े,
अंधियारे की हर दीवार को एक नज़र में जो फेड़े।

स्वर्ण-थाल सा नभ में चमके, कर्मठता का अमर प्रतीक,
बिना थके जो चलता जाए, छोड़ समय पर अपनी लीक।
तप-तप कर अंगारों जैसा, जग को जीवन दान दिया,
विष पीकर अंधकार का, सबको केवल अमृत-गान दिया।

ओस की बूँदों में छिपकर जो सतरंगी हँसी हँसाता है,
मुरझाए फूलों के मन में फिर उम्मीद जगाता है।
शाम ढले जब रक्त-वर्ण हो, सिंदूरी चादर ताने,
जाते-जाते भी सिखा जाए—हर अंत नया कल लाने।

अंगारों का ताज पहनकर, चलता है जो सीना ताने,
माप रहा ब्रह्मांड अकेला, जग के सारे ताने-बाने।
सात अश्व का वेग लिए जो, दिग्-दिगंत को दहकाता,
मूक तपस्वी सा नभ-पथ पर, मौन साधना दोहराता।

पर्वत की ऊँची चोटियों को, स्वर्ण-किरीट पहनाता है,
नदियों के चंचल दर्पण में, अपना रूप निहार जाता है।
ताप उसी का, तेज उसी का, सृष्टि का हर स्पंदन वो,
शून्य गगन के मस्तक पर जो, जलता हुआ विभूषण वो।

मृत्युंजय बन तम को निगले, जीवन का संदेशा लाए,
थक कर बैठ न जाना पथिक, यही निरंतर बतलाए।
जिस दिन तू भी सूरज जैसा, स्वयं जलना सीखेगा,
तेरी राहों के सम्मुख फिर, सारा जग नतमस्तक दिखेगा।

शाम ढले जब रक्त-वर्ण हो, सिंदूरी चादर ताने,
जाते-जाते भी सिखा जाए—हर अंत नया कल लाने।
पश्चिम की गोदी में सोकर भी जो अमर प्रभात संजोता है,
उसका ढलना अंत नहीं, बस एक नए युग का होना है।

English Poem by Shivam Dhuriya : 112038812
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