Nehru Files - 111 in Hindi Magazine by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-111

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नेहरू फाइल्स - भूल-111

भूल-111 
भारत रत्न : सुपात्रों को नजरअंदाज करना 

सरदार पटेल को सन् 1991 में और डॉ. आंबेडकर को 1990 में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया! ऐसा भी इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि केंद्र में वर्ष 1989 के बाद से ही गैर-वंशवादी सरकारें थीं—वी.पी. सिंह, फिर चंद्रशेखर और उनके बाद पी.वी. नरसिम्हा राव की।

आउटलुक-सीएनएन-आईबीएन-हिस्टरी18 चैनल-बी.बी.सी. के जनमत सर्वेक्षण में डॉ. बी.आर. आंबेडकर को ‘गांधी के बाद सबसे महान् भारतीय’ घोषित किया गया था, जिसके परिणाम 15 अगस्त, 2012 को घोषित किए गए थे। इसके बावजूद उन्हें सन् 1990 में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इस जनमत सर्वेक्षण में 19,91,735 वोट के साथ आंबेडकर शीर्ष पर रहे थे, जबकि नेहरू सिर्फ 9,221 वोट के साथ सबसे नीचे यानी दसवें पायदान पर थे! (यू.आर.एल.66) 

सुभाषचंद्र बोस को 1992 में मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया, जिसे बाद में कानूनी बारीकियों के बाद वापस ले लिया गया, वह भी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद। सरकार से नेताजी की मौत के निर्णायक साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था, जो करने में वह नाकाम रही। हालाँकि, शोचनीय बात यह है कि उन्हें सन् 1991 में ही नेताजी को इससे सम्मानित करने का खयाल कैसे आया, जबकि मरणोपरांत यह पुरस्कार देने का संशोधन 1955 में ही लाया जा चुका था? 

डॉ. राधाकृष्णन को सन् 1954 में, राजाजी को 1954 में, नेहरू को 1955 में—जब वे खुद प्रधानमंत्री थे, गोविंद बल्लभ पंत को 1957 में, बी.सी. रॉय को 1961 में, जाकिर हुसैन को 1963 में, इंदिरा गांधी को 1971 में—जब वे खुद प्रधानमंत्री थीं, वी.वी. गिरि को 1975 में, कामराज को 1976 में, विनोबा भावे को 1983 में, एम.जी.आर. को 1988 में और राजीव गांधी को 1991 में ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया! लेकिन सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस और डॉ. आंबेडकर इन योग्य लोगों जितने महान् नहीं थे कि उन्हें बाद में दिया गया! राजवंश उन्हें पसंद नहीं करता था! हमारे सामंती लोकतंत्र में बात इतनी व्यक्तिगत रही है। बेशक, राजवंश द्वारा की गई एक अन्यायपूर्ण बात यह रही कि बेचारे संजय गांधी को छोड़ दिया गया! 

राजवंश से बाहर के महान् लोग इंतजार कर सकते हैं, यहाँ तक कि स्वर्गवासी भी हो सकते हैं, लेकिन कोई जल्दी नहीं है। लेकिन राजवंश के वंशज, महान् हों या न हों, को इंतजार नहीं करवाया जा सकता—दो ने तो खुद को तब ‘भारत रत्न’ से नवाजे जाने दिया, जब वे खुद सत्ता में थे (नेहरू को सन् 1955 में और इंदिरा गांधी को 1971 में), जबकि राजीव गांधी को 1991 में उनकी मृत्यु के तुरंत बाद इससे सम्मानित किया गया! जब ‘भारत रत्न’ देने की बात आई तो मौलाना आजाद ने इनकार कर दिया और नेहरू से कहा कि पुरस्कार का निर्णय लेनेवालों के लिए यह बिल्कुल अनुचित है कि वे खुद को सम्मानित करना तय करें! मौलाना आजाद को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ मिला। 
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भूल-111 
भारत रत्न : सुपात्रों को नजरअंदाज करना 

सरदार पटेल को सन् 1991 में और डॉ. आंबेडकर को 1990 में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया! ऐसा भी इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि केंद्र में वर्ष 1989 के बाद से ही गैर-वंशवादी सरकारें थीं—वी.पी. सिंह, फिर चंद्रशेखर और उनके बाद पी.वी. नरसिम्हा राव की।

आउटलुक-सीएनएन-आईबीएन-हिस्टरी18 चैनल-बी.बी.सी. के जनमत सर्वेक्षण में डॉ. बी.आर. आंबेडकर को ‘गांधी के बाद सबसे महान् भारतीय’ घोषित किया गया था, जिसके परिणाम 15 अगस्त, 2012 को घोषित किए गए थे। इसके बावजूद उन्हें सन् 1990 में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इस जनमत सर्वेक्षण में 19,91,735 वोट के साथ आंबेडकर शीर्ष पर रहे थे, जबकि नेहरू सिर्फ 9,221 वोट के साथ सबसे नीचे यानी दसवें पायदान पर थे! (यू.आर.एल.66) 

सुभाषचंद्र बोस को 1992 में मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया, जिसे बाद में कानूनी बारीकियों के बाद वापस ले लिया गया, वह भी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद। सरकार से नेताजी की मौत के निर्णायक साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था, जो करने में वह नाकाम रही। हालाँकि, शोचनीय बात यह है कि उन्हें सन् 1991 में ही नेताजी को इससे सम्मानित करने का खयाल कैसे आया, जबकि मरणोपरांत यह पुरस्कार देने का संशोधन 1955 में ही लाया जा चुका था? 

डॉ. राधाकृष्णन को सन् 1954 में, राजाजी को 1954 में, नेहरू को 1955 में—जब वे खुद प्रधानमंत्री थे, गोविंद बल्लभ पंत को 1957 में, बी.सी. रॉय को 1961 में, जाकिर हुसैन को 1963 में, इंदिरा गांधी को 1971 में—जब वे खुद प्रधानमंत्री थीं, वी.वी. गिरि को 1975 में, कामराज को 1976 में, विनोबा भावे को 1983 में, एम.जी.आर. को 1988 में और राजीव गांधी को 1991 में ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया! लेकिन सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस और डॉ. आंबेडकर इन योग्य लोगों जितने महान् नहीं थे कि उन्हें बाद में दिया गया! राजवंश उन्हें पसंद नहीं करता था! हमारे सामंती लोकतंत्र में बात इतनी व्यक्तिगत रही है। बेशक, राजवंश द्वारा की गई एक अन्यायपूर्ण बात यह रही कि बेचारे संजय गांधी को छोड़ दिया गया! 

राजवंश से बाहर के महान् लोग इंतजार कर सकते हैं, यहाँ तक कि स्वर्गवासी भी हो सकते हैं, लेकिन कोई जल्दी नहीं है। लेकिन राजवंश के वंशज, महान् हों या न हों, को इंतजार नहीं करवाया जा सकता—दो ने तो खुद को तब ‘भारत रत्न’ से नवाजे जाने दिया, जब वे खुद सत्ता में थे (नेहरू को सन् 1955 में और इंदिरा गांधी को 1971 में), जबकि राजीव गांधी को 1991 में उनकी मृत्यु के तुरंत बाद इससे सम्मानित किया गया! जब ‘भारत रत्न’ देने की बात आई तो मौलाना आजाद ने इनकार कर दिया और नेहरू से कहा कि पुरस्कार का निर्णय लेनेवालों के लिए यह बिल्कुल अनुचित है कि वे खुद को सम्मानित करना तय करें! मौलाना आजाद को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ मिला।