वृंदावन की पावन भूमि, जहाँ हर ओर हरे-भरे वन, कदंब के वृक्ष और यमुना की लहरें कल-कल करती बहती थीं। यह वही स्थान था जहाँ भगवान विष्णु ने अपने अवतार के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म लिया। गोकुल और वृंदावन की गलियों में जब बालकृष्ण खेलते थे, तो उनके पीछे बाल-सखा, गोप-गोपियाँ और गायें लगी रहतीं। उनकी हँसी से वातावरण गूंज उठता और उनकी मुरली की धुन सुनकर पक्षी भी चुप हो जाते।
इसी वृंदावन में एक और दिव्य आत्मा का जन्म हुआ था – राधा रानी। वे स्वभाव से अत्यंत शांत, कोमल और अलौकिक सौंदर्य से संपन्न थीं। कहते हैं कि राधा कोई साधारण स्त्री नहीं थीं, बल्कि स्वयं लक्ष्मी जी का स्वरूप थीं। जब पहली बार राधा ने कृष्ण को देखा, वे खेलते हुए ग्वालबालों के बीच मुरली बजा रहे थे। राधा का हृदय जैसे ठहर गया हो। उनके नेत्र कृष्ण की छवि पर टिक गए। उसी क्षण राधा को महसूस हुआ कि उनका जीवन अब कृष्ण के नाम हो चुका है।
कृष्ण भी राधा के दर्शन से मंत्रमुग्ध हो उठे। यद्यपि वे छोटे थे, परंतु उनकी आँखों की चमक राधा के मन में उतर गई। ऐसा लगा मानो दो आत्माएँ पहली बार नहीं, बल्कि जन्मों से एक-दूसरे को पहचानती हों।
उसके बाद से जब भी कृष्ण बंसी बजाते, राधा अनायास ही खिंचकर चली आतीं। मुरली की धुन जैसे राधा के प्राणों को पुकारती। गोपियों के समूह में राधा की उपस्थिति कृष्ण के लिए सबसे विशेष थी।
एक बार की बात है, कृष्ण ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर राधा और उनकी सहेलियों पर छुपकर फूल बरसाए। राधा मुस्कुराईं, और उनकी वह मुस्कान कृष्ण के मन में गहरी छाप छोड़ गई। बचपन का यह नटखट खेल धीरे-धीरे एक ऐसे बंधन में बदलने लगा जो केवल हृदय ही नहीं, आत्मा को भी जोड़ता है।
गाँव के लोग इन दोनों के बाल-स्नेह को देख मुस्कुराते और कहते –
"यह प्रेम साधारण नहीं है। यह तो अविनाशी है, ईश्वर द्वारा रचा गया है।"
राधा और कृष्ण का बचपन का मिलन, मासूमियत से भरा हुआ था। इसमें न कोई स्वार्थ था, न कोई छल। यह बस दो निर्मल आत्माओं का मिलन था, जैसे नदी का जल सागर की ओर स्वाभाविक रूप से बहता है।
वृंदावन की वह भूमि, जहाँ हर प्रातः यमुना की लहरें मधुर कलरव करतीं और हवा कदंब वनों से होकर बहती, वहीं गूंजती थी कृष्ण की मुरली। जब भी उनकी बांसुरी बजती, समूचा वृंदावन मंत्रमुग्ध हो उठता। गोपियाँ अपने-अपने काम छोड़कर दौड़ पड़तीं, गायें चरना भूल जातीं और यहाँ तक कि पेड़-पौधे भी स्थिर होकर उस स्वर को सुनते।
परंतु, इस मधुर संगीत का सबसे गहरा प्रभाव जिस हृदय पर पड़ता था, वह थी राधा रानी।
कृष्ण की बांसुरी की हर धुन मानो राधा के प्राणों को छू जाती। वे अपने भीतर एक अजीब-सी शक्ति का अनुभव करतीं – एक ऐसा आकर्षण, जो देह से परे था।
राधा और कृष्ण का प्रेम बिल्कुल निर्मल था। इसमें न कोई वासना थी, न कोई अपेक्षा। यह वह प्रेम था जो आत्मा और परमात्मा के बीच होता है। राधा का जीवन कृष्ण के नाम समर्पित था, और कृष्ण भी राधा को अपनी आत्मा का अंश मानते थे।
एक दिन पूर्णिमा की रात थी। आकाश में चंद्रमा अपनी शीतल किरणें बिखेर रहा था, वृंदावन के वन पुष्पों की सुगंध से महक रहे थे। उसी रात कृष्ण ने अपनी बांसुरी उठाई और इतनी मधुर धुन छेड़ी कि सभी गोपियाँ अपनी-अपनी झोपड़ियों से निकलकर यमुना तट की ओर दौड़ पड़ीं।
गोपियों के मन में कोई स्वार्थ नहीं था। वे केवल कृष्ण के पास होना चाहती थीं। उस रात जो हुआ, वही संसार में प्रसिद्ध हुआ महान रास के नाम से।
कृष्ण ने अपनी योगमाया से प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य किया। हर गोपी को लगा कि कृष्ण केवल उसके साथ हैं। यह अनुभव इतना अद्भुत था कि समय ठहर गया, रात्रि चिरकालीन बन गई। परंतु, उस रासलीला में भी सबसे विशेष स्थान राधा का था।
कहा जाता है कि जब राधा वहां से थोड़ी देर के लिए चली गईं, तो कृष्ण ने रासलीला रोक दी। यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी लीला का केंद्र केवल राधा हैं। वे ही प्रेम की पराकाष्ठा हैं, वे ही कृष्ण के हृदय की धड़कन हैं।
वृंदावन का जीवन प्रेम और आनंद से भरा हुआ था। कृष्ण की बांसुरी, राधा की मुस्कान और गोपियों का उल्लास – सब कुछ मानो एक अलौकिक उत्सव था। लेकिन समय की धारा कभी स्थिर नहीं रहती। एक दिन ऐसा आया जब वृंदावन की इस मधुरता में करुणा का सागर उमड़ पड़ा।
कंस, जो मथुरा का अत्याचारी राजा था और कृष्ण का मामा भी, बार-बार षड्यंत्र रच रहा था। उसने अनेक बार कृष्ण को मारने के लिए राक्षस भेजे, लेकिन हर बार कृष्ण ने अपने पराक्रम से उनका वध कर दिया। अंततः कंस ने स्वयं कृष्ण को मथुरा बुला लिया।
गोकुल और वृंदावन के लोग जानते थे कि यह बुलावा सामान्य नहीं है। यह एक नई शुरुआत है – एक ऐसा मोड़ जहाँ कृष्ण को अपना दिव्य उद्देश्य निभाना है। जब कृष्ण मथुरा जाने लगे, तो पूरे वृंदावन का वातावरण शोक में डूब गया।
उस समय राधा के हृदय में जो वेदना उमड़ी, उसका वर्णन शब्दों में कठिन है।
कृष्ण के बिना वृंदावन की हर गली सूनी लगने लगी। पेड़-पौधे मुरझा गए, यमुना की लहरें जैसे धीमी पड़ गईं। राधा की आँखें बार-बार रास्ते की ओर टिक जातीं, मानो कृष्ण लौट आएँगे।
कहा जाता है कि जब रथ मथुरा की ओर चला, राधा मौन खड़ी रहीं। उनकी आँखों से आँसू बहते रहे लेकिन होंठों ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि वे जानती थीं – कृष्ण केवल उनके नहीं, वे समस्त जगत के हैं।
राधा और कृष्ण का यह बिछोह केवल देह का था। उनके हृदय कभी अलग नहीं हुए।
कृष्ण ने स्वयं कहा था –
"राधा, तुम मुझसे दूर नहीं हो। तुम तो मेरी आत्मा में हो। जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम हो।"
राधा का प्रेम इतना शुद्ध था कि उन्होंने कभी यह शिकायत नहीं की कि कृष्ण ने उन्हें छोड़ दिया। उनके लिए कृष्ण का वियोग भी एक प्रकार का योग बन गया। उनके आँसुओं ने प्रेम को और गहरा कर दिया।
कृष्ण का जीवन केवल लीला नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रहस्य से भरा हुआ था। वृंदावन की गलियों में हुई उनकी रासलीला, केवल नृत्य नहीं थी – वह आत्मा और परमात्मा का मिलन थी।
पूर्णिमा की रात, जब वृंदावन में चंद्रमा अपनी शीतल चाँदनी बिखेर रहा था, कृष्ण ने अपनी मुरली उठाई। उस धुन को सुनते ही सारी गोपियाँ अपने घर–आँगन का काम छोड़कर दौड़ी चली आईं।
कृष्ण ने अपनी योगमाया से हर गोपी के साथ रास किया, परंतु उस रास का केंद्र थीं – राधा।
कहा जाता है कि जब राधा थोड़ी देर के लिए वहां से चली गईं, तो कृष्ण ने रासलीला रोक दी। यह स्पष्ट कर दिया कि बिना राधा के उनकी कोई लीला पूर्ण नहीं है।
कृष्ण भगवान हैं, लेकिन उनका यह स्वरूप तभी संपूर्ण होता है जब राधा उनके साथ हों।
राधा भक्ति का स्वरूप हैं।
कृष्ण आनंद का स्वरूप हैं।
और जब दोनों मिलते हैं, तो होता है भक्ति और आनंद का अद्वैत मिलन।
शास्त्रों में कहा गया है कि –
"राधा बिना कृष्ण अधूरे हैं, और कृष्ण बिना राधा अस्तित्व में नहीं।"
राधा केवल एक प्रेमिका नहीं, बल्कि कृष्ण की शक्ति हैं।
जिस प्रकार चंद्रमा और उसकी चाँदनी अलग नहीं हो सकते, उसी प्रकार राधा और कृष्ण भी अलग नहीं हो सकते।
राधा हमें यह सिखाती हैं कि सच्चा प्रेम पाने की इच्छा नहीं करता, बल्कि केवल समर्पण चाहता है।
राधा ने कभी कृष्ण से मांग नहीं की कि वे उनके साथ रहें।
उन्होंने केवल यह स्वीकार किया कि कृष्ण उनके जीवन का आधार हैं।
और यही कारण है कि भक्ति में राधा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
जब भक्त कृष्ण का नाम लेते हैं, तो वे "राधे-कृष्ण" कहे बिना नहीं रहते। पहले राधा का नाम, फिर कृष्ण का – यही इस प्रेम की महानता है।
राधा का प्रेम हमें सांसारिक मोह से ऊपर उठाता है। यह प्रेम त्याग, धैर्य और भक्ति का प्रतीक है।
वह हमें सिखाता है कि भगवान तक पहुँचने का मार्ग केवल पूजा–पाठ से नहीं, बल्कि निष्कलंक प्रेम और समर्पण से है।
राधा और कृष्ण का प्रेम कोई साधारण प्रेम कहानी नहीं है। यह प्रेम अनंतकालीन है, जो युगों-युगों तक मानवता को भक्ति, त्याग और समर्पण का संदेश देता रहा है।
संसार का प्रेम अक्सर स्वार्थ, इच्छा और अपेक्षाओं से जुड़ा होता है। उसमें "पाना" महत्वपूर्ण होता है।
परंतु राधा–कृष्ण का प्रेम "पाने" पर आधारित नहीं था।
यह प्रेम आत्मा और परमात्मा के मिलन जैसा था, जहाँ न कोई मांग है, न कोई बंधन।
राधा ने कृष्ण से कभी नहीं कहा – “तुम मेरे साथ रहो।”
उन्होंने केवल कृष्ण को अपने हृदय में बसा लिया और विरह में भी उसी प्रेम को पूजा का रूप दिया।
वहीं कृष्ण ने भी यह स्वीकार किया कि –
"राधा मेरे हृदय की आत्मा हैं।"