अतीत से जुड़े पहलु. 2
अब आगे.........
गामाक्ष हकलाते हुए कहता है..." त तुम ..ये क्या कर रहे हो...?..."
दूसरी तरफ से काफी गुस्से वाली आवाज आती है....." दूसरों के घरों में बेवजह घुमना अच्छी बात नहीं होती , !
गामाक्ष दूर से आ रही एक चमकदार रोशनी को देखते हुए कहता है...." ये क्या चीज़ है , कोई दीपक या मशाल तो नहीं लगती.... बोलो विरूनाभ , तुम आंधी रात को क्या क्रिया कर रहे हो....?.."
विरूनाभ दांतों को भिंचते हुए कहता है...." तुम चुपचाप यहां से चले जाओ , नहीं तो मैं तुम्हें मारकर खा जाऊंगा..."
तभी उस जलती हुई रोशनी में से आवाज़ आती है...." कृपया मेरी सहायता कीजिए , मुझे इस दुष्ट से बचाइए..."
विरूनाभ चिल्लाते हुए कहता है......" चले जाओ यहां से , मेरा समय बर्बाद मत करो , नव ग्रह की चाल बदल जाएगी , जाओ यहां से,।।।।,
उसके चिल्लाने से आदिराज और अमोघनाथ की आंखें खुल जाती है और वो दोनों जल्दी से उस कमरे से बाहर आते हैं , जहां विरूनाभ गामाक्ष पर चिल्ला रहा था , वहां आसपास फैली बलि प्रथा की सामग्री को देखकर आदिराज पूछते हैं..." ये सब हो क्या रहा है यहां , ..?.. किसी की बलि दे रहे हो विरूनाभ....?..."
तभी उसकी पत्नी भागकर आकर आदिराज से कहती हैं...." हे ! दिव्य पुरुष, मेरे पति पिशाचों के राजा बनना चाहते हैं इस कारण आज नीलमावस पर ये वनदेवी की बलि दे रहे हैं , इन्हें रोक दीजिए...."
आदिराज हैरानी से सब तरफ देखते हुए पूछते हैं..." वनदेवी लेकिन यहां तो कोई नहीं है और तुम क्या कहना चाहती हो पिशाचों के राजा बनना चाहता है.?."
" हे ! दिव्य पुरुष , मेरे पति बहुत कमजोर स्वभाव के है जिनका पूरी प्रेत जाति में उपहास उड़ाया जाता है इसलिए इन्होंने ठाना था कि ये पिशाचों के राजा बनेंगे , इसलिए ये वो ज्योति जो आप देख रहे हैं , वो वनदेवी की रूह है , जिसे मेरे पति उन्हें धोखे से मारकर चुरा लाए थे और अब ये इनकी बलि देकर वो दिव्य शक्तियां प्राप्त करके पिशाचों के राजा बन जाएंगे..."
" लेकिन ये सब कैसे संभव है..?.."
" हे ! दिव्य पुरुष , मेरे पति ने अभी तक पांच सौ कुंवारी कन्या को प्रेताधिराज को बलि दी है , जिससे इन्हें कुछ अलौकिक शक्ति मिली है और अगर ये वनदेवी की बलि चढ़ा देंगे तो इन्हें कोई नहीं रोक सकता....आप सबके हित की सोचते हैं इसलिए इनसे बचाइए उस कन्या की आत्मा को...."
आदिराज हैरानी से विरूनाभ की पत्नी से पुछते है...." आखिर तुम ये सब बताकर कर अपने पति को संकट में क्यूं डालना चाहती हो....?...."
" क्यूंकि ये मुझे बलपूर्वक यहां लाए थे और मेरे साथ पत्नी के संबंध बनाए , मैं इन्हें स्वीकार नहीं करती ..."
" लेकिन तुम हो कौन...?.."
" मैं पास ही के गांव के मयोक तांत्रिक की बेटी हूं .."
" इसने वनदेवी को क्यूं चुना...?.."
" वनदेवी पूरे नकारात्मक ऊर्जा को प्रभावित कर सकती हैं , आज वो मावस है जिसे नीलमावास कहते हैं , इसी दिन इनकी शक्ति कमजोर पड़ती है इसलिए ये इनकी बलि देकर आखिरी शक्ति प्राप्त करके , सबसे शक्तिशाली बनना चाहता है...."
" तुम निश्चिन्त रहो मैं इसे इसके इरादों में कभी कामयाब नही होने दूंगा..."
इन दोनों की बात सुनकर गामाक्ष के चेहरे पर एक शैतानी हंसी आ जाती है, ,
अपना भेद बताने के लिए विरूनाभ अपनी पत्नी को मारने के लिए उसकी तरफ बढ़ जाता है लेकिन तभी उसके सामने एक सफेद रोशनी की दीवार खड़ी हो जाती है , जिसे वो पार नहीं कर पाता और बौखला जाता , और आदिराज पर चिल्लाते हुए कहता है...." तुम मेरे रास्ते में मत आओ , नहीं तो तुम भी मारे जाओगे...."
आदिराज गुस्से में घूरते हुए उससे कहते हैं...." मैंने तुझे एक साधारण सा प्रेत समझा था लेकिन तूझ जैसे प्रकृति में हस्तक्षेप करने वाले किसी भी पिशाच को जिंदा नहीं रहना चाहिए , तूने वनदेवी को मारकर उससे उनकी आत्मा चुराकर एक बहुत नीच काम किया है , तो तुझे भी जिंदा रहने का कोई अधिकार नहीं है , ...."
विरूनाभ की आंखें गुस्से में लाल हो रही थी और उसी गुस्से में कहता है....." तुम मेरी बरसों की मेहनत बर्बाद कर रहे हो , हट जाओ मेरे रास्ते से नहीं तो मुझे तुम पर अपनी पैशाची शक्तियों का हमला करना पड़ेगा..."
आदिराज हंसते हुए कहते हैं...." मुझे तुम नकारात्मक शक्ती से ड्रा रहे हो , शायद तुम ये भूल चुके हो नकारात्मक शक्तियों को खत्म करने के लिए ही सकारात्मक शक्तियां बनी है और तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते..."
विरुनाभ गुस्से में आदिराज पर एक काली शक्ती से हमला करता है जिससे आदिराज आंखें बंद करके कुछ मंत्र के जरिए उसे बीच में ही गायब कर देते हैं , जिससे एक पल के लिए विरूनाभ अचंभे में पड़ जाता है लेकिन अगले ही पल बिता देर किए दूसरी शक्ति से हमला करता है जो धीरे धीरे एक बड़े से नुकीले दांत वाले शेर का रूप ले लेती है जिसका रंग देखने में काला और उसकी बड़ी बड़ी सफेद आंखें थीं , जो किसी भी आम इंसान को डरा दे , लेकिन आदिराज सबको पीछे रहने की कहकर, खुद मंत्रो को उच्चारित करने लगते हैं जिससे पर भर में वो शेर राख का ढेर बन जाता है..
.हर बार जितने की कारण आदिराज को अपनी सिद्धी पर और भी ज्यादा भरोसा हो गया था लेकिन वही बार बार हारने पर विरूनाभ बहुत ज्यादा उत्तेजित हो गया था और गुस्से में बार बार हमला किए जा रहा था लेकिन आदिराज के सामने उसकी शक्तियां कम पड़ रही थी ,
अब इस खेल को खत्म करने के लिए आदिराज ने प्रेतजाल कैद शक्ति का इस्तेमाल किया और जिससे वो वहीं बंध गया लेकिन आदिराज हैरानी से उसे देखते हुए कहते ....." इससे तो इसे मर जाना चाहिए था...ये सिर्फ हमारी कैद में है , "
तभी उसकी पत्नी आकर कहती हैं...." हे ! दिव्य पुरुष , इसे केवल वनदेवी ही मार सकती है लेकिन वो शरीर को खो चुकी है......
आदिराज के सामने अब एक चुनौती थी.....
....................to be continued...............