: : प्रकरण - 43 : :
सुंदर काम करता था. उस से मुझे कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन काम करने के तरीके से मुझे नाराजगी थी. वह पूरा टाईम भाव के पीछे भागता रहता था. अप डेट लेता रहता था.
मैंने उस को समजाया था.
" पूरा दिन भाव के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है. सुबह मार्किट खुलते ही शेयर खरीद लेना. उस की मूवमेंट देख लेना. वह कहाँ तक जा सकता हैं. ऊपर जाता हैं तो टारगेट सेट कर के बैठ जाना. वहाँ पहुंचने पर ब्रोकर शेयर बेच देगा और तुम्हे बता देगा. "
लेकिन वह इंट्रा डे में काम करता था. बहुतेक सुबह में शेयर खरीदकर मार्केट बंद होने पर भाव बढ़ने पर उसे बेच देता था. यह जोखमी था. नुकसान होने की संभावना थी. मैं उसे मना करता था.
वह बाकी कुछ करता नहीं था. इस स्थिति में अपने आप को व्यस्त रखने के लिये शेयर मार्किट के साथ भागता रहता था. और घड़ी घड़ी सब को परेशान करता रहता था.
वह देख नहीं सकता था इस के लिये सतत तंगदिली के माहौल में चिंतित होकर घड़ी घड़ी भावों को देखता रहता था. भाव बढ़ने पर पुलकित हो जाता था और चिल्लाता रहता था भाव भाग रहा था.
दस मिनिट के काम के पीछे वह पूरा दिन उस के पीछे लगा रहता था और सब को काम पर लगाता था.. हर घड़ी भाव की पूछपाछ कर के तंग करता था. और बाद में देर हो गई करके अपनी मा पर चिल्लाता था.. वह लगातार उस के पीछे लगा रहता था. शेयर बाजार तो छोड़ो वह उस की क्रिया प्रक्रिया की चौकीदारी करता था उसे चैन से बैठने नहीं देता था.
मा बेटे हर एक चीज में मेरी पीछे पड़ जाते थे, मेरी हर हरकत पर नजर रखते थे, मुझे टोकते रहते थे. मेरी गलतियां निकालने में लगे रहते थे.
मैंने दोनों को कई बार समजाया था. लेकिन उस से कुछ फर्क नहीं आया था. वह दोनों की जुबान दो पल भी रूकती नहीं थी.
कोई भी फोन आता था तो पूछपाछ शुरू हो जाती थी उन के रवइये से ऐसा लगता था. उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं था.
एक बार एक लड़की का फ़ोन आया था. जो मेरी साथ करती थी और हमारे घर आई थी.. उस ने कुछ पूछा था, जिस का जवाब मेरे पास नहीं था. मैंने उस को बाद में बताने को कहां था.
सुंदर की एक ओर आदत थी.. वह सब बातचीत पर अपने कान रखता था. दुसरी रूम में होते ही उस ने हमारी बातें सुन ली थी.. और जाकर अपनी मा को बताया था. और उस ने मुझ पर संदेह व्यक्त किया था.
यह बात आरती के दिमाग़ में घर कर गई थी. वह बारबार मुझे ताना मारती रहती थी. उस का ऐसा रवईया मुझे तकलीफ होती थी. लेकिन दोनों को मेरी कोई फ़िक्र नहीं थी. सुन्दर के मन तो मैंने उस का नौकर बन गया था. वह मेरा बाप बन गया था.
मैंने कई बार उसे भी कहां था, समजाया था.. हर चीज में बोलना बंध करो. लेकिन उस की नजर से कोई बात छुट्टी नहीं था. मुझे उस की बातों से कंटाला आता था, गुस्सा भी आता था.
एक बार मैंने मोबाइल के लिये मामूली दस रूपये खर्च किये थे जो उस के हिसाब से जरुरी नहीं था. उस पर उस ने संभाषण शुरू किया था. सुनकर मुझे गुस्सा आया था. और मैंने उस पर हाथ उठाया तो वह मुझे मारने लगा और मुझे जोर से धक्का दिया और मैं जमीन पर गिर गया. मुझे भारी चोट आई थी.. मैं खड़ा हो नहीं सकता था. मैंने उन्हें मेरी लड़की के बेटे को फ़ोन करने को कहां था.
लेकिन उन्होंने कोई दयान नहीं दिया था.. इस स्थिति में कछुए की चाल में बैडरूम में गया था. और मोबाइल उठाकर भांजे को फ़ोन किया था.
वह हमारे फेमिली डोक्टर को लेकर घर आया था. उन्होंने मुझे देखकर निदान किया था.
" फ्रैक्चर हुआ है अस्पताल ले जाना पड़ेगा. "
इतना कहकर वह 500 रूपये विझिट चार्ज लेकर चले गये थे. मैं चलने की स्थिति में नहीं था तो मुझे एम्बुलेंस में अस्पताल ले गये थे.
फ्रैक्चर के अलावा भी दूसरी हानि हुई थी. मेरी पीछे का बोल टूट गया था. उस का ओपरेशन किया गया था. मुझे कम से कम 10 दिन अस्पताल में रखा गया था. और 80 से 99 हजार का बिल बन गया था.
अगर सुंदर दस रूपये के बारे में बवाल खड़ा नहीं करता तो ऐसा नहीं होता.. यह उस की गलती से हुआ था. लेकिन मा ओर बेटा यह बात स्वीकारने को तैयार नहीं थे. खर्चा होने पर मुझे दोषित ठहरा कर रोना धोना शुरू कर दिया था.
उस के बाद मुझे अनाथो के लिये बनी एक अस्पताल में दाखिल किया गया था. वहाँ कितना खर्चा होगा उस के बारे में मुझे कुछ बताया नहीं गया था.
शुरू में ऐसा बताया गया था. वह निशुल्क था.. वहाँ के डोक्टर ने मेरी साथ अच्छा सलूक किया था. उन की भागीदार एक औरत थी जो उस की बीवी की सहेली थी जिस के साथ मिलकर डोक्टर ने यह अस्पताल शुरू किया था.
दोनों ने ऐसा दिखावा किया था मानो मेरी उन से पुरानी पहचान थी.
लड़की ने मुझे देखकर नाम लेकर मेरा स्वागत किया था. और मुझे अचंबित किया था.
" पहचाना कोलेज में मेरी पीछे रहते थे. मुझे वडा पाव खिलाते थे. "
मैं उस की बात को सच मानने लगा था.. और पुरानी बातें याद करने की कोशिश की थी.
क्या था? मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मैं उसे बेटी मानने लगा था. वह भी मेरा ख्याल रखती थी. मैं लेखक था. यह बात मैंने उसे बताई थी.
अस्पताल में कई लोग उन के पेशंट्स को मिलने आते थे.. उस लड़की का नाम श्रेयांसी था. वह सब को बताती रहती थी :
" यह महाशय एक लेखक हैं.
सुनकर सब लोग मेरा अभिवादन करते थे.. हाथ जोड़ कर प्रणाम करते थे. युवा लोग मेरे पैर भी छूते थे.
और मैं उन्हें अपनी रचना का आस्वाद दिलाता था.
' मेरी व्यथा किसे कहूं मेरी कथा किसे कहूं?
जीवन पथ चलते दो थक गया दो कदम किसे कहूं
जिगर में दर्द थामकर चला जाता हूं
कहना मत अकेला चला जाता हूं
आंसू रो रो पीता हूं मुस्कुरा कर जीता हूं
दोस्त नहीं यार कोई जख़्मी दिल को सीता हूं
श्रेयांसी की वजह से मुझे पब्लिसिटी मिली थी. लोगो ने मुझे जाना था, मेरा सन्मान किया था. यह मेरे लिये बड़ी उपलब्धि थी.
0000000000 ( क्रमशः)