A companion of memories - Ranjan Kumar Desai - (45) in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (45)

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (45)


                    :  : प्रकरण - 45 : :

       आज से छह से भी ज्यादा दायके के पहले परिस्थिति बिल्कुल अलग थी. फिल्मों में कुछ ना कुछ संदेश होता था. लोगो को कुछ नया जानना सीखना मिलता था.

        उस जमाने में वी शांताराम ने अपनी फिल्मों के जरिये नया मकाम प्राप्त किया था. कुछ अलग दिखाने का प्रयास किया था.

      ' झनक झनक पायल बाजे ' , ' दो आंखे बारह हाथ ' और '  तूफान और दिया ' फिल्मों के जरिये उन्होंने ने हंगामा मचा दिया था. यह तीनो फ़िल्म टिकिट बारी पर काफ़ी सफल रही थी. बाकी दो फिल्मों में कोई संदेश हो या ना हो लेकिन ' दो आंखे बारह हाथ ' में उन्होंने बड़ा काम किया था.

      फ़िल्म में उन्होंने कैदियो को सुधारने का जिम्मा लिया था.

       फ़िल्म का एक गीत बड़ा लोकप्रिय था.

       यह एक ही गीत था जो फ़िल्म में दो बार अलग तरीके से प्रदर्शित किया गया था.

       पहले यह गीत जेल के केदी उन्हें एक प्रार्थना के रूप में गाते हैं :

       ए मालिक तेरे बंदे हम,

       ऐसे हो हमारे करम

       नैकी पर चले और  बदी से टले

        ताकि हसते हुए निकले दम

        जब जुल्मो का हो सामना

         तब तु ही हमें थामना

         वो बुराई करे  हम भलाई करे

         नहीं बदले की हो कामना

          बढ़ चुके प्यार का हर कदम

          और मिटे बैर का यह भरम

           नेकी पर चले ताकि हसते हुए निकले दम

        केदी सुधर कर जेल से बाहर आते हैं. उस वजह से कुछ व्यापारी लोग उन पर हमला करते हैं.. उन को बचाने में जेलर की मौत हो जाती हैं.

        फ़िल्म में एक खिलोने वाली का रोल था. जो जैलर को जानती थी, उसे मानती थी. दोनों को एक फ्रेम में कभी नहीं बताया था.

       जेलर की मौत पर वह लड़की वही प्रार्थना दोहराती हैं.

       यह अंधेरा घना छा रहा

       तेरा इंसान गभरा रहा..

       गीत खतम होते ही वह अपनी चुडिया तोड़ देती हैं. जो उस के जैलर के प्रति प्यार का संकेत था..

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        ' यादों की सहेलगाह ' लिखने के पहले मैंने दो उपन्यास लिखी थी.

         ' नैना बरसे रिमझिम रिमझिम '

           और बिना पंख के पंखी

        नैना.. उपन्यास लिखने की प्रेरणा मुझे अपने ही रिश्तेदारों से मिली थी. वह दोनों बहन थी और गुजरात में खुद के बंगले में रहते थे. उन के लडके लड़की भी साथ रहते थे. वह हमेशा एक दुसरे के साथ होते था. मिलना, बातें करना बिल्कुल सहज था. उन दोनों में प्यार था. वह किसी को बताये बिना शादी के बंधन में बंध जाते हैं. उस से नानी मा को बड़ा सदमा लगता हैं और वह मौत की नींद सो जाती हैं.

     बाकी तो ठीक. लेकिन नजदीकी रिश्ते में शादी के बारे में पाबंदी लगाई गई हैं. क्यों उस का जवाब उन दोनों की शादी ने दिया था.

       उन के घर बेटे का जन्म होता हैं जो मुक हैं, बोल नहीं सकता इतना ही उस के बाप को भी बीमारी लग जाती हैं जिसे कोढ कहते हैं., उस से सारे शरीर पर सफ़ेद दाग हो जाते हैं.

      इस घटना के कारण मुझे यह उपन्यास लिखने की प्रेरणा मिली थी.

      कोलेज पिकनिक में दो अनजान लड़का लड़की मिलते हैं, वह दोनों एक ही मा के संतान थे. वह दोनों यह बात जानते नहीं थे. 

       लड़का पिकनिक में लड़की को किसी लडके के अत्याचार से उसे बचाता हैं. और दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं. लडके को किसी गैर औरत ने पाल पोषकर बड़ा किया था. उस की पालक मा गांव में रहती थी.

        वह उस लड़की को शादी करने जा रहा था. उस के लिये अपनी मा को शहर बुलाता हैं. उस की मा उस लड़की के मात पिता से मिलती है. तब राज खुलता हैं. दोनों ने एक ही मा की कोख से जन्म लिया था. उन की शादी होना संभावित नहीं था. यह बात लड़की बर्दास्त नहीं कर सकती, वह दूसरे लडके से भी शादी करने की स्थिति में नहीं थी, वह असाध्य बीमारी का शिकार हो जाती हैं और वह दुनिया छोड़ जाती हैं.

       बाकी जो होना था वह कुदरत का खेल था लेकिन मैंने सच्चाई से अवगत करने के लिये रोका तो कुदरत ने उसे दूसरी बीमारी की लपेट में ले लिया.

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      दूसरी उपन्यास में मैंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया था.

       हम लोग बिना पांख के पंखी है जो अपनी इच्छा के मुताबिक उड़ नहीं सकते. 

       वह गांव में रहता था. उस का पिता सुथारी काम करते थे. उस का धंधा अच्छा चल रहा था. लेकिन उन की जिद थी उस का बेटा भी यह धंधा जारी रखे. इस लिये उन्होंने लडके की पढ़ाई रोकने का प्रयास किया था. फिर भी वह अपने बाप की बात मानने को तैयार नहीं था. उस के पिता मतलबी हो गये थे.

      वह पढ़ाई करने बैठता और उसे दूसरे काम में लगा देते थे.

       और उसे रोकते थे.

        " तुम एक सुथार के बेटे हो तुम्हारे हाथ में किताब नहीं बल्कि हथोड़े और खिल्ले ही शोभा देते हैं. "

         लडके का नाम वापस था. वह अपने पिता की जबरदस्ती बर्दास्त नहीं कर पाया था.

        एक दिन वह रेकड़ी में सामान लेकर स्कूल से गुजर रहा था. रास्ते में स्कूल था. टीचर की आवाज आ रही थी जिसे सुनकर वह खो गया था. 

       उस का मानो वास्तविक जगत से दयान ही हट गया था. जिस वजह से रेकड़ी को एक ट्रक ने कुचल दिया था. और सारा सामान टूट गया था. इस स्थिति में उस की घर जाने की हिम्मत नही हुई थी. और वह घर से भाग गया था.

        उस के कदम उसे स्टेशन तक घसीट ले गये थे. और कुछ भी सोचे बिना वह बिना टिकिट गाड़ी में बैठकर मुंबई पहुंच गया था. शायद किस्मत भी वही चाहती थी, इस लिये वह टी सी की नजर से बच गया था और वह मुंबई पहुंच गया था.

      वहाँ उसे चाय की होटल में वेईटर और झाड़ू पोछा करने का काम मिल गया था. वह दिन भर होटल में काम करता था रात को स्कूल में जाता था.

       और ऐसे ही समय के साथ उस की पढ़ाई  हो गई थी, उस ने कोलेज में भी दाखिला लिया तय था. वह इतर  प्रवृत्ति में भी माहिर था. उस ने कोलेज डे के सांस्कृतिक कार्यक्रम में एक छोटी नाटिका पेश कर करके अपनी सच्चाई लोगो के सामने  रखी थी. उस से संजना नाम की लड़की बड़ी प्रभावित हुई थी. दोनों के बीच प्यार हो गया था.

     लेकिन उस का संजना की सहेली के साथ परिचय हुआ था, वह एक बच्चे की मा थी.. उस को एक बेटा था जो अपाहिज था. उसे वापस में अपने पिता को देखने लगा था.

     दूसरी तरफ संजना की मा ने उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया था. और दोनों की राहे बदल गई थी. वापस ने उस की सहेली के बेटे की खातिर उस से शादी कर ली थी.

                        00000000000   ( क्रमशः )