A companion of memories - Ranjan Kumar Desai - (46) in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (46)

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (46)


                     : :  प्रकरण - 46 : :

         गोवेर्धन राय त्रिपाठी में उपन्यास ' सरस्वती चंद्र' लिखी थी जो चार भाग में थी और काफ़ी लंबी थी, उन्हें पूर्ण करने के लिये उन्हें काफ़ी समय लगा था. और उसे बार बार लिखना पड़ा था.

       इसी तरह लिओ टोल्सतोय का किस्सा था. उन्हें भी अपनी उपन्यास बार बार लिखनी पड़ी थी, जिस वजह से उन्हें काफ़ी समय लग गया था. 

       फिल्मों में एक टीम थी, राम से ब्रदर्स की जिन्हे फिल्मों में होरर लाने का श्रेय प्राप्त था.

        उन की मिनर्वा थियेटर की पड़ोश में ओफिस थी.. मैं एक कहानी के सिलसिले में कुमार राम से मिला था.

        उस समय राजेंद्र सिंह बेदी की दस्तक फ़िल्म अप्सरा थियेटर में रिलीज़ हुई थी. उस की कहानी की सचित्र - संवाद सहित किताब भी पब्लिश हुई थी.

        उसे देखकर मुझे उस कहानी को गुजराती में अनुवाद करने का विचार आया था. मैं उस के बारे में बेदी साहब को मिला था. उन्होंने मुझे अनुवाद करने की रजा मंदी भी थी. उस सिलसिले में गुजरात में एक परिचित व्यकित मिला था. लेकिन बात नहीं बनी थी. और मुझे अनुवाद करने की बात को भूलना पड़ा था.

          फिल्मों के  अनेकानेक महानुभावों को मिलने का मुझे श्रेय प्राप्त हुआ था, जिस में चोपडा ब्रदर्स शामिल थे.

         यश चोपड़ा को मैं कई बार बार विध विध जगह पर मिलने का मौका मिला था जिस में राज कमल स्टूडियो, जहाँ उन का पहले ओफिस था, उन का घर, ताज महालक्ष्मी और एयर पोर्ट.

        उन की डायरेक्ट की हुई ' त्रिशूल ' के बारे में मैंने सुना था. फ़िल्म के निर्माता गुलशन राय ने उन्हें इंटरवल के बाद की फ़िल्म री शूट करने को कहां था. उस वक़्त मैं उन का इंटरव्यू लेने उनके घर गया था. उन की एक बात मुझे पसंद थी. उन को मिलने के लिये कोई  अपॉइंटमेंट की आवश्यकता नहीं थी. मैं ज़ब चाहूं उन को मिल सकता था.

        मैंने उन्हें इंटरव्यू लेने की बात की थी और वह तैयार हो गये थे.

        मैंने पहला सवाल किया था..

        " आप के बडे भाई की फिल्मे डायरेक्ट करना छोड़ दिया या और कोई वजह थी. "

        " हम दोनों भाइयों में कोई समस्या नहीं थी.. लेकिन वह मुझे एक फ़िल्म देते थे जैसे की ' धूल का फूल ' बाद में उन्होंने ' क़ानून ' फ़िल्म डायरेक्ट थी. उस के बाद ' धर्मपुत्र मुझ से डायरेक्ट करवाई थी.. उस बीच काफ़ी समय था, मेरे पास कोई काम नहीं था, मुझे बेकार बैठना पड़ा था. यह सिलसिला जारी हो गया था.. अपने को सदा व्यस्त करने के लिये मैंने निर्माता वितरक श्री गुलशन राय की ' दीवार ' फ़िल्म डायरेक्ट करने की ओफर स्वीकार कर ली. वह उन की ' जॉनी मेरा नाम ' फ़िल्म से ज्यादा सुपर हिट साबित हुई. और उन्होंने अपनी फ़िल्म ' त्रिशूल' फ़िल्म भी मुझे सौंप दी. "

       " ऐसा सुना गया हैं की यह फ़िल्म मिस्टर गुलशन राय ने आप को इंटरवल के बाद रिशूट करने को बोला था. उस की क्या वजह थी?? "

        यह तो एक लंबी कहानी है उसे चंद शब्दों में बताई नहीं जा सकती, उस के लिये अभी मेरे पास समय भी नहीं हैं. "

         कहकर उन्हें ने टाल दिया था.

         ' क़ानून ' तरह इत्तेफ़ाक़ भी बनी थी जिस में कोई  गाना नहीं था. वह एक रात की  कहानी थी और एक गुजराती नाटक पर बनी थी.

        मैं ओफिस के काम के लिये अक्सर फ्लाइट में दिल्ली जाता था. तब मुझे यश चोपड़ाजी मिल गये थे, उन के साथ तो कोई बात नहीं थी, लेकिन उस के साथ कॉमेडियन स्टार देवेन वर्मा मौजूद थे. मैंने उन को सवाल किया था. तो उन्होंने ने मुझे बताया था.

      " यश चोपड़ा जी को छोड़ने आया हूं.. "

       इसी तरह एक बार फ्लाइट में मुझे चरित्र अभिनेता आलोक नाथ भी मिल गये थे. मैं गलती से उन की सीट पर बैठ गया था. मैंने अपना नंबर बताने की गलती की थी. सुनकर उन्होंने में मुझे कहां था.

      " एक ही नंबर की दो सीट कैसे हो सकती हैं? "

      मैंने अपना नंबर चेक करके माफ़ी मांगी थी और उन्हें सीट दे दी थी. 

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           मेरे मौसे ने मुझे काफ़ी प्रताड़ित, तंग किया था. बारबार मुझे उन के कारनामें याद आते थे. वह सदा मेरा आत्म बिश्वास तोड़ने की कोशिश में जुड़े रहते था. मौसी भी उस में पीछे नहीं थी. उन्होंने ने गीता बहन को भी बहुत परेशान किया था.

           मौसे ने उन का यौन शोषण किया था. उस से गीता बहन प्रेग्नेंट हुए थे उस वक़्त उस की इज्जत बचाने का दावा करते हुए गर्भ निकाल दिया था इतना ही नहीं उन का गर्भाशय निकलवा दिया था, जिस से वह कभी मा ना बन सके. दोनों ने बहुत बड़ा लंबा गेम खेला था. भविष्य में उन की शादी हो तो मिल्कत में हिस्सा मांगने को उनकी तरफ से कोई ना बचे.

       वह इतने शातिर थे. उन्होंने ने अपने छोटे भाई की शादी करवाई थी. और उसे पागल बना दिया था और हिस्सा अपने नाम कर लिया था. इतना ही छोटे भाई की बहू के सत्य अवैध नाता बनाया था

       उतना ही उसे घर की नौकरानी बनाकर ऱख दिया था.

       उन की बड़ी लड़की ने मेरी सगेरी मम्मी के ममेरे भाई से शादी की थी.

       उन्होंने पाप करने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी.

       उस की सजा भगवान ने उन्हें दी थी. उस को छोटी उम्र में उठा लिया था.

        मैं लेखक था. लिखता था. इस बात उन के लडके को विश्वास नहीं था. उस ने अपने लडके के सामने मेरी तोहिन की थी. उस ने अपने लडके को मेरे बारे में सवाल किया था.

       "  क्या यह अंकल तुम्हे किसी भी एंगल से लेखक लगते हैं? "

        मैंने उस के इस ताने का प्रायोगिक उत्तर दिया था.

         मेरी बाइस कहानी का संग्रह मैंने उसे कुरियर में भेजकर उस को तगड़ा जवाब दिया था. उस गधे में उतनी भी तमीज नही की वह मुझे अभिनन्दन दे. वह बड़ी कंपनी का अफसर था लेकिन बच्चे जैसी भी अकक्ल नहीं थी.

        मैंने एक कहानी के जरिये उस के बारे एक बड़ा ताना मारा था लेकिन उस में इतनी हिम्मत नहीं थी के उस के बारे में कोई सवाल करे.

                     0000000000000   ( क्रमशः)