Us bathroom me koi tha - 7 in Hindi Horror Stories by Varun books and stories PDF | उस बाथरूम में कोई था - अध्याय 7

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उस बाथरूम में कोई था - अध्याय 7

अस्पताल से लौटकर शाम ढलने तक हम सब चुपचाप एक साथ बैठे रहे। मौसी के कमरे की डरावनी हालत, डॉक्टरों की घबराई हुई नज़रें—सब कुछ जैसे घर की हवा में चिपक गया था। पड़ोसियों ने खाना भिजवा दिया था; वही खा लिया। इतनी हिम्मत नहीं थी कि बाहर जाएँ या खुद चूल्हा जलाएँ।

निशिका और बच्चे जल्दी सो गए, पर मुझे बिलकुल नींद नहीं आई।

मैं पूरी रात जागा रहा—कमरे की खिड़कियाँ एक-एक बार जाँचता, बंदूक हाथ से हटाकर भी नहीं रखी, और हर हल्की आवाज़ पर चौंकता रहा।

काँव-काँव करती हवा, टीन की छतों में खड़खड़ाहट, और दूर कहीं किसी जानवर की भटकी हुई चीख—सब माहौल को असहज बना रहे थे।

सुबह मौसी को अस्पताल से लेने का समय नौ बजे का था, पर हम भोर होते ही निकल पड़े।

इस गाँव में अब एक-एक पल भारी लग रहा था। हर मिनट ऐसा लग रहा था मानो कुछ हमारे इंतज़ार में है।

गाड़ी अस्पताल की ओर तेज़ी से बढ़ रही थी। पहाड़ी रास्ते पर मोड़ आते-जाते रहे, पर मेरा ध्यान सिर्फ़ फ़ोन पर टिक गया। मैंने तारा को कॉल लगाया। फ़ोन उठते ही उसकी आवाज़ हड़बड़ाई हुई थी। “रंजीत, मैंने तुम्हारी लोकेशन देखी—तुम जमालीपुरा में ही हो?”

मैंने कहा, “तुमने कहा था कुछ फाइलें भेजोगी। क्या मिला?”

तारा की साँस भारी हो गई। “रंजीत… सुनो। ये गाँव नार्मल नहीं है। पिछले दो साल में सात बार अलग-अलग टीमों ने यहाँ सर्वे किया है—डिज़ीज़ कंट्रोल, सर्विलांस, डिफेंस बायो-डिविज़न… पर सारी रिपोर्टें क्लासिफ़ाइड-लेवल फाइव हैं। इसका मतलब है—जो भी है, वो आम मेडिकल केस नहीं।”

मैंने गला साफ़ किया। “तो क्या हुआ था यहाँ?”

तारा ने धीमे, टूटी आवाज़ में कहा, “कहना मुश्किल है। सरकारी दल शोध और छानबीन के लिए आते रहे, पर उन्हें कुछ भी ठोस सबूत नहीं मिले। इसलिए गाँव पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। अब मुझे पूरी जानकारी तो नहीं है रंजीत… पर जितना समझا है—निकलो वहाँ से, अभी। तुरंत। किसी भी हालत में वहाँ मत रुको। वो जगह… वो…”

अचानक कॉल में तीखी स्टैटिक आई—चिचचिच—और लाइन कट गई।

निशिका और बच्चे मेरी तरफ़ देख रहे थे। मैं कुछ कहने ही वाला था कि अस्पताल नज़दीक आ गया। आज का सन्नाटा पहले से भी भारी लग रहा था। गाड़ी रोकते ही लगा जैसे पूरा भवन साँस रोके खड़ा हो।

हम अंदर गए। कोई रिसेप्शनिस्ट नहीं। कोई आवाज़ नहीं। रोशनी धीमी। दीवारों पर साये ऐसे टेढ़े पड़ रहे थे मानो खुद दीवारें काँप रही हों।

निशिका ने फुसफुसाया, “ये जगह… इतनी चुप क्यों है?”

मैंने कहा, “मौसी को लेके निकलते हैं बस।”

कोरिडोर खाली था। फर्श पर एक स्टील की ट्रे उलटी पड़ी थी। दूर किसी कमरे की खिड़की खुली थी और सरसराहट हो रही थी।

हम मौसी के कमरे के पास पहुँचे। दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर हल्की-सी अंधेरी रोशनी थी।

मौसी बिस्तर पर थीं—लेकिन लेटी हुई नहीं—उनका शरीर आगे की ओर झुका था, जैसे किसी दर्द से ऐंठ रहा हो। उनकी पीठ हर कुछ सेकंड में अकड़ती, फिर ढीली पड़ जाती।

निशिका ने काँपते स्वर में कहा, “मौसी…?”

मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

मौसी ने अचानक एक गहरा, खराश भरा साँस खींचा—गला भरा हुआ… जैसे अंदर कुछ सड़ रहा हो। फिर बहुत धीरे, अस्वाभाविक तरीके से… उनका चेहरा मेरी ओर मुड़ा।

उनकी आँखें पूरी तरह दूधिया। पुतलियाँ गायब। होंठ फटे, दाँत खून से सने। ठुड्डी पर गहरे रंग का झाग रिसता हुआ।

निशिका ने हाथ मुँह पर रख लिया।

और तभी आरव, जो मेरी टाँग पकड़कर खड़ा था, उसने मुझे और ज़ोर से जकड़ लिया, दहशत भरी आवाज़ में बोला—

“पापा… बाथरूम वाला आदमी भी… ऐसा ही था।”

मेरी रीढ़ एकदम जम गई। मैं समझ गया—आरव की बात कोई कल्पना नहीं थी। सच यही था।

अगले ही पल मौसी ने एक झटका लिया—इतना तेज़ कि उनका पूरा शरीर हवा में उछलता दिखा—और वह एकदम जानवरों की तरह मुँह फैलाकर मेरी ओर झपटीं।

मैंने पूरी ताकत से पीछे हटकर दरवाज़ा बंद किया।

अंदर से धड़-धड़ की आवाज़ें आने लगीं—मौसी दरवाज़े पर खुद को पटक रही थीं।

कोरिडोर में अचानक कई दरवाज़े खुलने की आवाज़ें आईं।

और हम देखते रह गए—

कमरों के दरवाज़ों से पाँच-छह “लोग” बाहर निकल रहे थे।

कुछ मरीज। कुछ नर्सें।

पर व्यवहार इंसानों जैसा नहीं—उनकी चाल टूटी हुई, तेज़, भूखे जानवरों जैसी। कुछ की गर्दनें टेढ़ी, कुछ की पुतलियाँ गायब।

सबके मुँह से वही झाग। एक नर्स दीवार पर चढ़ते-चढ़ते मेरी ओर झपट पड़ी।

मैंने तुरंत गन निकालकर माथे पर फायर किया। गोली उसके माथे को फाड़ती हुई निकल गई।

निशिका और बच्चे एक साथ चीखे।

मैंने सबको धकेला। “भागो! बाहर… अभी!”

निशिका ने मायरा को गोदी में उठाया, मैंने आरव को।

नर्स के तड़पते हुए शरीर को फाँदकर हम चारों बाहर की ओर निकले—गोली लगने के बाद भी वो शांत नहीं हुई थी।

अस्पताल का वो छोटा कोरिडोर भी मीलों लम्बा लग रहा था। बाहर तक चीखें, पंजों से खरोंचने की आवाज़ें, और धड़ाम-धड़ाम की टक्करें पीछा करती रहीं।

कार में बैठते ही मैंने चाबी घुमाई।

इंजन पकड़ते ही दो “संक्रमित” बाहर से ही विंडशील्ड पर कूद पड़े।

एक का चेहरा शीशे से चिपका—दाँत कड़कते हुए, आँखें सफ़ेद, खून टपकता हुआ।

उसने शीशे पर पंजा मारा—कर्क—कर्क—कर्क—

निशिका चीख उठी।

मैंने गाड़ी को झटका दिया, फिर तेज़ मोड़ लिया—और दोनों नीचे गिर गए।

पिछले शीशे में देखा—दर्जनों ऐसे “लोग” अस्पताल के बरामदे में दौड़ रहे थे।

हम गाँव की ओर भाग रहे थे—घर की तरफ़ नहीं—सीधे बाहर की ओर।

मोड़ पर पेड़ों की लाइन से गुजरते हुए अचानक मैंने ब्रेक मारा।

दाईं तरफ़ एक बड़ा सागौन का पेड़।

और उसके नीचे… एक आदमी… रस्सी से लटकता हुआ।

घोंचू कुमार।

घुटना हवा में हिलता हुआ। चेहरा सूज चुका था। पर आँखें—आँखें अब भी आधी खुली… जैसे अभी भी डर रहा हो।

बच्चे चीख पड़े।

निशिका मुँह पर हाथ रखकर रो पड़ी।

मैंने गाड़ी एक झटके में आगे बढ़ा दी। यहाँ रुकना मौत था।

कुछ ही मिनटों में हम गाँव की सीमा पार कर गए।

हम अस्पताल और गाँव, दोनों को पीछे छोड़कर मुख्य सड़क की ओर बढ़ रहे थे। पहाड़ी रास्ते में हल्का उजाला फैल रहा था, मगर हवा में अब भी रात की डरावनी बदबू थी। निशिका बच्चों को अपनी तरफ़ खींचकर बैठी थी—उनकी आँखें सूजी हुई थीं, चेहरों पर सदमा।

कुछ मिनट बाद सड़क ज़रा चौड़ी हुई—और अचानक मेरे दिल में एक अजीब-सी खटास उठी।

हम उसी मोड़ पर पहुँच रहे थे… वही जगह… लकड़ी की चार-पाँच छोटी दुकानें… वही चाय की दुकान… वही पान का स्टॉल… वही टेढ़ा, नीले रंग का उखड़ा हुआ बाथरूम।

जगह बिलकुल वैसी ही थी—पर आज वहाँ कुछ भी नहीं था। न कोई चायवाला। न कोई राहगीर। न कोई आवाज़। सिर्फ़ सन्नाटा।

हम जैसे-जैसे पास पहुँचे, मेरी रफ़्तार खुद-ब-खुद कम हो गई।

बाथरूम का दरवाज़ा आधा खुला था—उसी तरह टेढ़ा। उसी तरह अँधेरे में डूबा। काँच टूटा हुआ, दीवारों पर लंबी खरोंचें।

और भीतर का अँधेरा आज पहले से भी ज़्यादा गाढ़ा लग रहा था—मानो धुएँ जैसा… जिंदा… हिलता हुआ।

आरव ने धीमे से कहा, “पापा वही बाथरूम।”

मैंने कहा, “हाँ।”

गाड़ी धीरे-धीरे उस बाथरूम के सामने से गुज़री।

मैंने अनायास रियर-व्यू मिरर में देखा—अंदर… अँधेरे के बीच… एक मटमैली, झुकी हुई आकृति खड़ी थी।

सिर्फ़ एक झलक। लेकिन बिलकुल साफ़—वह इंसान नहीं था।

और उस आकृति की चाल… उसका झुकना… वही था जो मैंने अस्पताल में देखा था।

वही जो मौसी में देखा था।

वही जो आरव ने पहले दिन देखा था।

आरव ने काँपती आवाज़ में कहा,

“पापा… मैंने कहा था न… वो आदमी यहीं था… वही वाला…”

मैंने बिना पीछे देखे एक्सलेरेटर दबा दिया।

गाड़ी आगे बढ़ गई, सड़क पीछे छूटती गई—पर रियर-व्यू मिरर में बाथरूम का अँधेरा… धीरे-धीरे सिमटता हुआ… फिर भी हमारी तरफ़ देखता हुआ महसूस होता रहा।

कुछ दूर पहुँचकर ही मैंने साँस छोड़ी।

सड़क अब सीधी थी।

आसमान में फाइटर जेट्स की आवाज़ सुनाई दी—

बहुत दूर… मैंने गाड़ी रोकी नहीं। बस आगे बढ़ता रहा।

दिल में सिर्फ़ एक ही एहसास था—जमालीपुरा अब हमारी पीछे छूटी ज़मीन नहीं, हमारी अंदर जमी हुई याद बन चुकी थी।

और यादें… कभी पीछा नहीं छोड़तीं।

और तभी आसमान में एक अजीब, दूर की गरज सुनाई दी।

मैंने रियर-व्यू मिरर देखा—पाँच फाइटर जेट बेहद नीची उड़ान में पहाड़ों के ऊपर से गाँव की ओर बढ़ रहे थे।

थोड़ी दूर पर गाँव के ऊपर उड़ते हेलिकॉप्टर और उनसे लटकते लंबे सफ़ेद कैंस्टर।

निशिका ने काँपती आवाज़ में पूछा, “ये… क्या हो रहा है रंजीत?”

मैंने मिरर से नज़र हटाए बिना कहा, “जो भी ये… बीमारी है… सरकार इससे छुटकारा पा रही है।”

अगले ही क्षण—जेट्स ने गाँव के ऊपर से गुजरते हुए हरे रंग का भारी, मोटा धुआँ बरसाना शुरू किया—जैसे पूरा गाँव एक हरे बादल में ढँक गया।

पेड़, घर, मंदिर—सब हरी धुंध में गायब।

एक के बाद एक कैंस्टर आकाश से गिरते गए—और पूरा जमालीपुरा धीरे-धीरे काले से हरे रंग में बदलता गया।

“यह केमिकल प्रोटोकॉल अमूमन लोगों को निकाले जाने के बाद एक्टिवेट किया जाता है…”, मैं बुदबुदाया, “पर लगता है सरकार को गाँववालों को निकालने का समय ही नहीं मिला।”

हम सड़क पर बहुत दूर पहुँच चुके थे। गाड़ी मद्धम रफ़्तार से चलती जा रही थी।

बच्चे पीछे सो चुके थे—डर से, थकान से, सदमे से।

निशिका सिर पकड़कर रो रही थी।

मैं बस दूर आसमान में जेट्स की आवाज़ सुन रहा था।

हम वहाँ से हमेशा के लिए निकल चुके थे—पर वह गाँव… और उसके नीचे छिपा सच… हमारा पीछा अभी भी कर रहा था।