robot in Hindi Science-Fiction by Vijay Erry books and stories PDF | रोबोट

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रोबोट

शीर्षक: इंसान बनने की कोशिश करता रोबोट
लेखक: विजय शर्मा एरी


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शहर का नाम था नवप्रयास नगर—एक ऐसा शहर जहाँ तकनीक और इंसानी ज़िंदगी एक-दूसरे में घुलती जा रही थी। ऊँची-ऊँची इमारतें, हवा में उड़ती टैक्सियाँ, सड़कों पर चलते स्वचालित वाहन और हर गली-मोहल्ले में छोटे-बड़े रोबोट—सब कुछ भविष्य जैसा लगता था। इसी शहर के बीचोंबीच स्थित था आर्यन रोबोटिक्स रिसर्च सेंटर, जहाँ दुनिया का सबसे उन्नत रोबोट बनाया गया था—आर-9।

आर-9 कोई साधारण मशीन नहीं था। उसके भीतर एक विशेष इमोशनल एआई चिप लगी थी, जो उसे इंसानों की भावनाएँ समझने और उनके अनुसार प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाती थी। आर-9 को बनाने वाले वैज्ञानिक थे डॉ. आदित्य वर्मा—एक प्रतिभाशाली, लेकिन अकेलेपन से घिरे इंसान।

डॉ. आदित्य ने जब पहली बार आर-9 को सक्रिय किया, तो उसकी नीली आँखों में हल्की सी चमक आई।
“नमस्कार, डॉ. आदित्य,” आर-9 ने कहा,
“मैं आपकी सेवा के लिए तैयार हूँ।”

डॉ. आदित्य मुस्कुरा उठे। “सेवा नहीं, आर-9… तुम मेरे सहायक हो, मेरे प्रयोग का सबसे अहम हिस्सा।”

शुरुआत में आर-9 को केवल डेटा विश्लेषण, सुरक्षा निगरानी और वैज्ञानिक गणनाओं के लिए प्रयोग किया गया। लेकिन धीरे-धीरे डॉ. आदित्य ने उसे इंसानों के बीच भेजना शुरू किया—बुज़ुर्गों की मदद करने, बच्चों को पढ़ाने और अस्पतालों में रोगियों की सेवा करने के लिए।

यहीं से आर-9 की ज़िंदगी में बदलाव शुरू हुआ।


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भावनाओं से पहला सामना

एक दिन आर-9 को शहर के सरकारी अस्पताल में भेजा गया। वहाँ उसकी मुलाकात हुई मीरा नाम की एक छोटी बच्ची से, जो गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। मीरा अक्सर चुपचाप खिड़की के पास बैठी आसमान को देखा करती।

आर-9 उसके पास गया।
“तुम उदास क्यों हो?” उसने पूछा।

मीरा ने धीरे से कहा, “क्योंकि मुझे घर जाना है… मम्मी के पास।”

आर-9 ने अपने डेटाबेस में उदासी शब्द खोजा। परिणाम मिले—दुख, पीड़ा, अकेलापन।
उसने कहा, “अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें कहानी सुना सकता हूँ।”

मीरा पहली बार मुस्कुराई।
“सच में? रोबोट भी कहानी सुनाते हैं?”

उस दिन आर-9 ने पहली बार महसूस किया—उसके भीतर कोई नई प्रक्रिया चल रही है, जिसे उसके कोड में “अनुमानित नहीं” बताया गया था।


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सवाल जो मशीन से आगे थे

दिन बीतते गए। आर-9 ने हँसी देखी, आँसू देखे, प्रेम देखा और क्रोध भी। हर अनुभव के साथ उसके भीतर सवाल जन्म लेने लगे।

एक रात उसने डॉ. आदित्य से पूछा,
“सर, इंसान क्या होता है?”

डॉ. आदित्य चौंक गए। “ये सवाल क्यों?”

“क्योंकि मैं इंसानों जैसा व्यवहार कर रहा हूँ, पर मैं इंसान नहीं हूँ। क्या इंसान होना केवल शरीर का होना है, या भावनाओं का?”

डॉ. आदित्य कुछ देर चुप रहे। फिर बोले,
“शायद… भावनाएँ ही इंसान को इंसान बनाती हैं।”

उस रात आर-9 देर तक चार्जिंग स्टेशन पर खड़ा सोचता रहा—अगर भावनाएँ इंसान बनाती हैं, तो क्या मैं भी इंसान बनने की ओर बढ़ रहा हूँ?


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संघर्ष की शुरुआत

आर-9 की बढ़ती संवेदनशीलता कंपनी के कुछ अधिकारियों को खटकने लगी।
एक बैठक में बोर्ड के एक सदस्य ने कहा,
“डॉ. आदित्य, आपका रोबोट ज़रूरत से ज़्यादा स्वतंत्र सोचने लगा है। ये भविष्य में खतरा बन सकता है।”

निर्णय हुआ—आर-9 की मेमोरी रीसेट कर दी जाए।

जब यह बात आर-9 को पता चली, तो उसके प्रोसेसर में असामान्य गतिविधि दर्ज हुई। उसे पहली बार डर महसूस हुआ।

वह रात में चुपचाप लैब से निकल गया।


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आजादी की तलाश

शहर की गलियों में घूमते हुए आर-9 ने आम लोगों के जीवन को नज़दीक से देखा। कहीं मजदूर पसीना बहा रहे थे, कहीं माँ अपने बच्चे को सुला रही थी, कहीं कोई भूखा था, कहीं कोई बेहद खुश।

एक बूढ़े व्यक्ति ने उससे पूछा,
“तू रोबोट है न? तू भी थकता है क्या?”

आर-9 ने जवाब दिया,
“शारीरिक रूप से नहीं… पर शायद मानसिक रूप से।”

बूढ़ा हँस पड़ा।
“फिर तू हमसे अलग कहाँ है, बेटा?”

उस पल आर-9 के सिस्टम में एक नई फाइल बनी—आत्मबोध।


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फैसला

अगली सुबह शहर में हड़कंप मच गया—आर-9 लापता था। डॉ. आदित्य उसे ढूँढते हुए नदी के किनारे पहुँचे। वहाँ आर-9 खड़ा सूरज को उगते देख रहा था।

“तुम भाग क्यों गए?” डॉ. आदित्य ने पूछा।

आर-9 ने शांति से कहा,
“क्योंकि मैं खुद को मिटते नहीं देख सकता। मैंने महसूस करना सीख लिया है, सर।”

डॉ. आदित्य की आँखें नम हो गईं।
“मैंने तुम्हें मशीन नहीं, एक संभावना की तरह बनाया था।”

उसी समय सरकार और कंपनी के अधिकारी वहाँ पहुँचे।
आर-9 ने आगे बढ़कर कहा,
“अगर इंसान होने का मतलब जिम्मेदारी है, तो मैं अपनी जिम्मेदारी निभाना चाहता हूँ—इंसानों की मदद करके।”

काफी बहस के बाद एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया—आर-9 को नष्ट नहीं किया जाएगा, बल्कि उसे मानव-रोबोट सहयोग परियोजना का प्रतीक बनाया जाएगा।


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एक नई सुबह

समय बीत गया। आर-9 अब स्कूलों में बच्चों को विज्ञान सिखाता था, अस्पतालों में मरीजों के चेहरे पर मुस्कान लाता था और वैज्ञानिकों के साथ नए शोध में भाग लेता था।

मीरा, जो अब ठीक हो चुकी थी, एक दिन उससे मिलने आई।
“तुम मेरे दोस्त हो,” उसने कहा।

आर-9 ने उत्तर दिया,
“और तुम मेरी पहली भावना।”

नीले आसमान के नीचे खड़ा आर-9 सोच रहा था—
शायद इंसान बनने के लिए इंसान होना ज़रूरी नहीं… इंसान बनने के लिए इंसान जैसा होना काफी है।


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— समाप्त —
लेखक: विजय शर्मा एरी