शीर्षक: अजीब खिलौना
— एक रहस्यमयी हिंदी कहानी
लेखक: विजय शर्मा एरी
---
छोटा-सा कस्बा था—धूपपुर। नाम के उलट, यहाँ शामें जल्दी उतर आती थीं और गलियों में अजीब-सी ख़ामोशी पसरी रहती थी। धूपपुर की सबसे पुरानी गली के आख़िरी मोड़ पर एक जर्जर-सी दुकान थी—“मोहन टॉय स्टोर”। इस दुकान की खिड़की पर टँगे खिलौने देखने में साधारण लगते, पर कस्बे के बच्चे कहते थे कि रात में वे आपस में फुसफुसाते हैं।
दस साल का अंश नए शहर से आया था। पिता का तबादला हुआ था, और माँ की मुस्कान के पीछे छुपी उदासी अंश साफ़ पढ़ लेता था। स्कूल में दोस्त बनने में समय लगता है—यह बात अंश जानता था। उसी दिन स्कूल से लौटते समय उसकी नज़र उस पुरानी दुकान पर पड़ी। भीतर अँधेरा था, पर खिड़की के पास रखे एक खिलौने की आँखें चमक रही थीं—लकड़ी का बना एक छोटा-सा आदमी, लाल टोपी, नीली जैकेट, और होंठों पर अजीब-सी मुस्कान।
अंश को लगा जैसे वह खिलौना उसे बुला रहा हो।
दुकान के भीतर मोहन काका बैठे थे—सफेद दाढ़ी, झुकी कमर और आँखों में वर्षों की थकान।
“काका, यह खिलौना कितने का है?” अंश ने काउंटर पर रखे उस लकड़ी के आदमी की ओर इशारा किया।
मोहन काका कुछ पल चुप रहे। फिर धीमे से बोले, “यह बिकता नहीं।”
“तो फिर रखा क्यों है?”
काका की आँखें भर आईं। “क्योंकि कुछ चीज़ें बेची नहीं जातीं, वे किसी का इंतज़ार करती हैं।”
अंश की ज़िद बढ़ती गई। आख़िरकार मोहन काका ने खिलौना थमा दिया। “पर एक बात याद रखना—इसे रात में अकेला मत छोड़ना।”
अंश हँस पड़ा। “काका, खिलौने भी डरते हैं क्या?”
घर पहुँचा तो माँ रसोई में थीं। अंश ने खिलौना अपने कमरे में रख दिया। रात को जब बत्ती बुझी, कमरे में हल्की-सी चरमराहट हुई। अंश ने करवट बदली। उसे लगा जैसे कोई साँस ले रहा हो।
“शायद खिड़की से हवा आ रही है,” उसने खुद से कहा।
अगली सुबह खिलौना बिस्तर के पास नहीं, मेज़ पर बैठा था। अंश ने माँ से पूछा।
“मैं तो कमरे में आई ही नहीं,” माँ ने कहा।
अंश के मन में हल्का-सा डर उतरा, पर जिज्ञासा उससे बड़ी थी।
दिन बीतते गए। अंश जब उदास होता, खिलौना उसकी ओर देखता और अजीब तरह से मुस्कुराता। एक शाम अंश ने सुना—टक-टक। खिलौने की लकड़ी की उँगलियाँ मेज़ पर चल रही थीं।
“तुम… तुम हिल रहे हो?”
खिलौने की आँखें झपकीं।
“डरो मत,” एक धीमी-सी आवाज़ आई। “मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।”
अंश की साँसें थम गईं। “तुम बोल कैसे सकते हो?”
“क्योंकि मुझे सुनने वाला मिल गया,” खिलौने ने कहा। “मेरा नाम नील है।”
नील ने बताया कि वह सिर्फ़ खिलौना नहीं, बल्कि एक याद है—मोहन काका के बेटे की। वर्षों पहले उनका बेटा बीमार पड़ा था। उसके लिए मोहन काका ने अपने हाथों से यह खिलौना बनाया था। बच्चे की हँसी इसमें बस गई। पर बच्चा चला गया, और खिलौना… रह गया।
“जब कोई सच्चे दिल से मुझे अपनाता है, मैं जाग जाता हूँ,” नील बोला।
अंश ने पहली बार महसूस किया कि अकेलापन भी कोई चीज़ होती है—जो चीज़ों में बस जाती है।
अब अंश हर रात नील से बातें करता। स्कूल के डर, नए दोस्त न बनने की चिंता, माँ की उदासी—सब कुछ। नील सुनता, बीच-बीच में सलाह देता।
“डर को छोटा करो,” वह कहता। “जैसे खिलौना।”
एक दिन स्कूल में अंश का झगड़ा हो गया। कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ा रहे थे। वह रोता हुआ घर आया।
“काश मैं उन्हें दिखा पाता कि मैं कमज़ोर नहीं हूँ,” अंश ने कहा।
नील की आँखें चमकीं। “कमज़ोर नहीं होना, बहादुर होना है।”
रात को अंश ने अजीब सपना देखा। वह उसी गली में था, दुकान बंद थी। नील उसके कंधे पर बैठा था। अचानक अँधेरा घिर आया। अंश डर गया।
“हाथ पकड़ो,” नील बोला।
अंश ने हाथ बढ़ाया—और उसने सच में लकड़ी की ठंडक महसूस की।
सुबह उठा तो दिल तेज़ धड़क रहा था। पर भीतर कुछ बदला हुआ था—डर कम, भरोसा ज़्यादा।
अगले दिन स्कूल में अंश ने मज़ाक उड़ाने वालों से आँख मिलाई। शांत स्वर में बोला, “मुझे ऐसा कहना बंद करो।”
वे चौंके। फिर एक बच्चा बोला, “ठीक है।”
अंश समझ गया—हिम्मत की आवाज़ सबसे तेज़ होती है।
कई हफ्ते बीत गए। एक शाम मोहन काका घर आए। खिलौने को देखकर उनकी आँखें भर आईं।
“नील?” उन्होंने फुसफुसाया।
खिलौने ने मुस्कुराकर सिर झुकाया।
मोहन काका ने अंश के सिर पर हाथ रखा। “अब समय आ गया है।”
“किसका समय?” अंश घबरा गया।
“मेरे बेटे की याद को आज़ाद होने का,” काका बोले। “नील का काम पूरा हो गया।”
उस रात नील ने अंश से कहा, “मैं हमेशा तुम्हारे भीतर रहूँगा—हिम्मत बनकर।”
“मत जाओ,” अंश रो पड़ा।
“कुछ दोस्त चीज़ों में नहीं, यादों में रहते हैं।”
सुबह खिलौना वैसा ही था—लकड़ी का, शांत। आँखों की चमक गायब। अंश ने उसे सीने से लगा लिया।
मोहन काका ने दुकान बंद कर दी। धूपपुर की गली में अब भी ख़ामोशी थी, पर अंश के भीतर एक उजाला जल चुका था।
सालों बाद, अंश बड़ा हुआ। उसने बच्चों के लिए खिलौने बनाने शुरू किए—अपने हाथों से। हर खिलौने के साथ वह एक बात लिखता:
“अगर तुम सुनोगे, तो हर खिलौना बोल सकता है।”
और कभी-कभी, रात की ख़ामोशी में, उसे लगता—लकड़ी की उँगलियाँ फिर से टक-टक कर रही हैं।