Yashaswini - 38 in Hindi Fiction Stories by Dr Yogendra Kumar Pandey books and stories PDF | यशस्विनी - 38

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यशस्विनी - 38

दूषित मन की ग्लानि

जब स्वामी मुक्तानंद स्वयं ध्यान में डूबे रहते थे तो स्वामी अक्षयानंद रोहित से योग का अभ्यास करवाते थे। अब रोहित के जीवन से सभी तरह की चिंताओं का विसर्जन होने लगा और वे स्वयं को हल्का महसूस करने लगे। कुछ दिन पहले जब रोहित की नेहा से भेंट होती थी तो ऐसा हो जाता था कि रोहित का सारा ध्यान मानो नेहा अपनी और खींच लेती थी। रोहित नेहा से नज़रे चुराने की कोशिश करता था लेकिन फिर थोड़ी ही देर बाद उसकी नज़रें फिर नेहा की ओर देखने लगती थीं।

            जब मनुष्य साधना में ऊंचा उठता जाता है तो सांसारिक प्रलोभन और आकर्षण उसे और तीव्र गति से अपनी ओर आकर्षित करते हैं।उदाहरण के लिए कोई मीठा छोड़ना चाहे तो बार-बार उसका ध्यान मीठे खाद्य पदार्थों की ओर ही जाएगा।यशस्विनी के प्रति रोहित का गहरा प्रेम संपूर्ण नहीं हो पाया था और उसमें यशस्विनी की मृत्यु के बाद वैराग्य भाव जाग्रत हो गया था लेकिन आश्रम में पिछले कई दिनों से यशस्विनी की ही प्रतिरूप दिखाई देने वाली नेहा को देखकर यह वैराग्य अब गहरे राग और तीव्र आकर्षण में बदल गया था।

          आज आश्रम की जीव विज्ञान प्रयोगशाला में नेहा को प्रयोग करते हुए बहुत देर हो गई थी। आश्रम के अन्य साधक प्रयोगशाला से जा चुके थे। नेहा ने उनके जाने के बाद भी अपना कार्य जारी रखा। कार्य पूरा हो जाने के बाद उसने प्रयोगशाला के उपकरणों को व्यवस्थित रखने के कार्य में सहायता के लिए रोहित को फोन किया और रोहित तत्काल वहां जा पहुंचा।

   रात्रि के 11 बज चुके थे। नेहा अभी भी एक बड़े टेक्नो मशीन के पास एक परखनली में कुछ द्रव्य डालकर और बीच-बीच में सूक्ष्मदर्शी से कुछ अध्ययन करते हुए प्रयोग कर ही रही थी। रोहित ने कक्ष के द्वार पर पहुंचकर नेहा की ओर देखा।प्रयोगशाला की खिड़कियों से बाहर इस पर्वतीय क्षेत्र का रात्रि का अप्रतिम सौंदर्य दिखाई दे रहा है।नेहा रोहित की उपस्थिति से अनभिज्ञ अपने कार्य में निमग्न थी और रोहित नेहा के अपूर्व सौंदर्य को एकटक देखता रह गया। यह क्या?रोहित पर यह कैसा सम्मोहन व्याप्त हो रहा है? आसमान में खिला हुआ पूर्णिमा का मुखचंद्र...... नेहा की आंखों में ही एक सम्मोहन है…. उसके खुले हुए केश जैसे चांदनी रात में बादलों से बनी हुई सुंदर अलकावलि हो……सुंदर देहयष्टि ....... रात्रि का यह मादक वातावरण...तुहिन कणों की वातावरण में हल्की वृष्टि से कभी ढंके,तो कभी उघड़ते उन्नत पर्वत शिखर… अपनी उज्ज्वल आभा बिखेरते...... बिजली से चमक उठे हों।…. प्रकृति के इस आकर्षण क्षेत्र में सरोवर है तो घाटियां भी हैं।यह इस पर्वतीय क्षेत्र की रात्रि का आकर्षण है या नेहा के रूप सौंदर्य का? वह समझ नहीं पा रहा है.....इस मूक आमंत्रण में जैसे रोहित बंध सा गया। उसके हृदय में एक हूक सी उठी।वह मंत्रमुग्ध सा नेहा की ओर बढ़ा। क्या यही सृष्टि के प्रारंभ में प्रथम पुरुष का प्रथम स्त्री के प्रति उत्पन्न होने वाला तीव्र आकर्षण है…रोहित समझ नहीं पा रहा है…..

   नेहा आज सुबह से प्रयोगशाला में ही व्यस्त थी और दिन भर की थकी हुई नेहा को जैसे रोहित को देखते ही प्रसन्नता की अनुभूति हुई हो। वह सूक्ष्मदर्शी के पास से हटी और परखनली निर्धारित स्थान में रखी।अब नेहा अपनी दोनों बांहें फैलाएं रोहित की ओर बढ़ने लगी। रोहित ने भी आगे बढ़कर उसे अपने हृदय से लगा लिया……

     "अरे आंखें खोलो रोहित! तुम द्वार पर ही गिर पड़े हो। प्रयोगशाला में कब पहुंचे? मुझे तुमने आवाज तो दी होती।" द्वार पर खड़े रोहित के गिरने की आवाज सुनकर नेहा उसकी ओर दौड़ पड़ी थी। रोहित ने अपनी आंखें खोलीं।

"मैं ठीक हूं नेहा, मुझे कुछ नहीं हुआ है, बस जैसे यहां पहुंच कर मेरा स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहा और मैं नीचे गिर गया था।"रोहित ने कहा।

"ओ साधक जी!साधना में इतना डूबना भी जरूरी नहीं है धीरे-धीरे आगे बढ़िए। और हां अपना ध्यान रखिए तथा स्वामी जी के निर्देशों के अनुसार ही साधना करिए, अपनी ओर से कुछ घटा बढ़ा मत करिए।"नेहा ने समझाया।

  नेहा ने रोहित को उठाया और रोहित नेहा का सहारा लेकर धीरे-धीरे अपने कक्ष में पहुंच गया लेकिन उसके मन में ग्लानि का अनुभव हो रहा था।वह सोचने लगा,नेहा में सौंदर्य है, लेकिन सादगी और पवित्रता से परिपूर्ण.... उसका सौंदर्य तो तो रात्रि के गहन अंधकार में जलते दीपक की लौ के समान पावन है;उसमें देह से बढ़कर आत्मा का प्रकाश है.....न जाने इसके स्थान पर नेहा के प्रति मेरे मन में कलुषित भाव कैसे आ रहे थे?रोहित को कक्ष में पहुंचाकर और हिदायतें देकर नेहा तुरंत लौट गई थी।      

      कुछ दिनों बाद नेहा रोहित के कक्ष में आई और मनुष्य शरीर के निर्माण में एक्स क्रोमोसोम और वाई क्रोमोसोम की भूमिका के संबंध में अपने अनुसंधान में विशेष प्रगति के बारे में रोहित को जानकारी दी। रोहित अपने कक्ष में नेहा की उपस्थिति से सहज नहीं थे।

"आप नॉर्मल क्यों नहीं हैं रोहित जी? आप इतने परेशान क्यों हैं? क्या मैं आपके कक्ष में आ गई हूं इसलिए?"नेहा ने जैसे सच्चाई ताड़ते हुए कहा।

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, मैंने समझा कि मेरे कक्ष में किसी युवती का इस तरह अकेले आना मुझे नहीं तो आश्रम के और लोगों को नागवार न गुजरे।"रोहित ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा।

"पुरुषों को महिलाओं के साथ यही तो प्रॉब्लम होती है। आप जैसे साधक नारी से दूर जाना चाहते हैं,वहीं अनेक दूषित चरित्र के पुरुषों के जीवन का हर क्षण जैसे नारी की ही खोज होती है। पुरुष यह क्यों भूल जाते हैं कि मुक्ति न तो नारी से दूर रहने में है, न नारी के सतत सानिध्य में रहकर अपना कर्तव्य भूलने में है।"नेहा ने कहा।

"तुम ठीक कहती हो नेहा! स्त्री से दूर रहने की कोशिश करने वाले भी उतने ही आसक्त हैं, जितने स्त्री के समीप जाने की कोशिश करने वाले होते हैं। सच्चाई यह है कि स्त्री अपने साथ केवल सहज मानवीय व्यवहार चाहती है।"रोहित ने विचार रखते हुए कहा।

नेहा ने  उन्हें छेड़ते हुए कहा,"और इस सहज व्यवहार का अभी का तकाजा यह है रोहित जी, कि अभी हम दोनों अपना काम रोककर एक-एक कप चाय पी लें।"

       

क्रमशः

योगेंद्र