Ashvdhaama: Ek yug purush - 10 in Hindi Science-Fiction by bhagwat singh naruka books and stories PDF | Ashvdhaama: एक युग पुरुष - 10

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Ashvdhaama: एक युग पुरुष - 10


अग्निवंश शांत बैठा था. उसके सामने धूनी जल रही थी, पर आग की लपटें नहीं काँप रही थीं — मानो स्वयं अग्नि भी सुनने को तैयार हो

.मैं. अश्वत्थामा. सहस्राब्दियों बाद पहली बार किसी को अपनी कथा सुनाने जा रहा था.

अश्वत्थामा ने गहरी साँस ली. मेरी आँखों में युगों की राख थी.

योगेश्वर,मैंने कहा,तुम मुझसे मेरे युद्ध पूछते हो,

मेरे शाप पूछते हो. पर कोई यह नहीं पूछता कि यह सब शुरू कैसे हुआ.उसने दृष्टि आकाश की ओर उठाई. वह आकाश,जिसे मैंने तब भी देखा था.

और आज भी वही है. जब शिक्षा एक युद्ध थी जब कौरव और पांडव बालक थे,

उसने कहना शुरू किया, 

तब वे राजकुमार थे,पर अभी राजा नहीं.

और तब मेरे पिता — द्रोणाचार्य — केवल एक गुरु नहीं थे

उनका गुरु बनने का सफर तो यहां से शुरू हुआ था

वे स्वयं एक युद्ध थे. संयम और प्रतिशोध के बीच. हस्तिनापुर उस समय विद्या का केंद्र नहीं था

वहाँ राजनीति थी, सत्ता थी, पर शास्त्र और शस्त्र का संतुलन नहीं.

लेकिन उन सब के बीच एक महान आत्मा थी जो अपने आप में युद्ध थी वो महा तपस्वी भी था

ओर महान योद्धा भी ओर एक महान राजा भी वो थे भीष्म पितामहा उनको जैसे ही पता चला कि एक साधु ने कैसे राजकुमार की गेंद को बिना किसी रस्सी से कुएं से निकाल दिया वो मिलने के लिए उन से आतुर थे

मेरे पिता को राज्यसभा मे भुलाया गया.

भीष्म पितामह ने यह भाँप लिया था.

उन्होंने कहा था—‘कुरुवंश को केवल तलवार नहीं, गुरु भी चाहिएऔर तब मेरे पिता को बुलाया गया.

द्रोणाचार्य का हस्तिनापुर में प्रवेश मैं आज भी वह दिन देख सकता हू

मेरे पिता, एक साधारण वस्त्रों में, हाथ में धनुष नहीं —केवल ज्ञान लेकर हस्तिनापुर पहुँचे.


दरबार में कई ने हँसकर देखा. कुछ ने सोचा — एक निर्धन ब्राह्मण क्या सिखाएगा राजकुमारों को?

पर भीष्म जानते थे.

उन्होंने सभा में कहा

जिसने परशुराम से अस्त्र विद्या पाई हो, वह निर्धन नहीं होता  वह स्वयं शस्त्रागार होता है.

पिता ने कुछ नहीं कहा.

उन्होंने केवल एक पत्ता उठाया. और धनुष से उसे दो भागों में नहीं, आठ बराबर हिस्सों में काट दिया. दरबार मौन हो गया. उसी क्षण मेरे पिता की जगह तय हो गई

.गुरुकुल की स्थापना — शिक्षा की पहली

अग्निहस्तिनापुर के बाहर एक वन क्षेत्र चुना गया. वहीं गुरुकुल बना. पांडव, कौरव — सब एक साथ. युधिष्ठिर का संयम, भीम की उग्र शक्ति, अर्जुन की एकाग्र दृष्टि, नकुल- सहदेव की निष्ठा, और कौरवों की महत्त्वाकांक्षा. मैं सब देख रहा था.

मेरे पिता ने पहले दिन कहा था यहाँ कोई राजकुमार नहीं. यहाँ केवल शिष्य होंगे.दुर्योधन को यह बात भीतर तक चुभी थी.।

क्योंकि उसके अंदर शुरू से ही एक अलग ही नजरिया रहा था.।


शिक्षा की पद्धति  पहले मन, फिर शस्त्र

उसने योगेश्वर, अग्निवंश से कहा,मेरे पिता ने पहले धनुष नहीं थमाया. उन्होंने पहले मौन सिखाया. घंटों ध्यानभूख सहनाअपमान सहना आदेश मानना जो इनसे टूट गया, वह कभी योद्धा नहीं बना.।

कई राजकुमार पहले ही सप्ताह लौट गए. पर पांडव और कौरव रुके. अर्जुन का उदय और मेरी छायाअर्जुन. उसकी आँखें लक्ष्य बन जाती थीं.

मेरे पिता ने उसे देखा और समझ गए  यह बालक तप से देवता बनेगा. ।

पर उन्होंने मुझे अलग रखा. मुझे उन्होंने वे बातें सिखाईं जो वे किसी को नहीं सिखाते थे.

क्योंकि मैं उनका पुत्र था. और क्योंकि वे जानते थे मेरे भीतर रुद्र सोया है.

योगेश्वर से कहा—तुम जानते हो, सबसे कठिन युद्ध क्या होता है?।

अपने पिता के सामने स्वयं को सिद्ध करना.मेरे पिता मुझे कभी विशेष नहीं मानते थे. वे चाहते थे कि कोई यह न कहे‘अश्वत्थामा को सब कुछ विरासत में मिला. ।

’उन्होंने मुझे सबसे कठोर अभ्यास दिए. कभी- कभी मैं रक्त से लथपथ होता. पर उन्होंने कभी हाथ नहीं रखा मेरे सिर पर. आज समझ आता है. वह उनकी सबसे बडी करुणा थी. 

हस्तिनापुर की राजनीति  शिक्षा के भीतर विषपर शिक्षा के साथ- साथ एक अलग ही खेल शकुनी खेल रहा था.

दरबार का विष भी गुरुकुल में घुस आया. दुर्योधन चाहता था सत्ता. पांडव चाहते थे धर्म. और अर्जुन चाहता था

श्रेष्ठता. मैं देख रहा था यह युद्ध केवल बाहर नहीं होगा. यह भीतर से शुरू हो चुका है.जिसका बीज गांधार राजकुमार शकुनी ने रोप दिया.

पहला रहस्य जो मैंने देखा योगेश्वर,

यह पहला रहस्य है, मैंने बोला महाभारत कुरुक्षेत्र में नहीं शुरू हुई थी.

वह गुरुकुल में शुरू हो चुकी थी.हर अभ्यास, हर तुलना, हर प्रशंसाएक बीज थी.

और मेरे पिता. वे जानते थे. द्रोणाचार्य की चुप्पीएक रात मैंने अपने पिता को अकेले देखा. वे धनुष के सामने बैठे थे.।

पर अभ्यास नहीं कर रहे थे. मैंने पूछा—पिता, क्या आप जानते हैं

कि यह युद्ध होगा? उन्होंने उत्तर नहीं दिया. बस इतना कहा—जब गुरु जानता है, तब भी उसे सिखाना पडता है. युद्ध हो या ना हो एक धर्म की रक्ष्या करने वाला योद्धा होता है.।

ओर तुम ये सवाल क्यों कर रहे हो अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करो पुत्र. उस रात मैंने पहली बार जाना ज्ञान भी कभी- कभी विवश होता है. ।

मैंने वहीं तय किया था. जब यह युद्ध होगा, मैं केवल दर्शक नहीं रहूँगा. मेरे पिता ने शिक्षा दी. पर संसार ने मुझे क्रोध दिया. और क्रोध. मेरे जैसे अमर के लिएसबसे खतरनाक शस्त्र है. ।

अग्निवंश मौन था. धूनी की आग तेज हो गई थी. उसने अंतिम शब्द कहे—यह तो केवल शुरुआत थी,।
योगेश्वर. अभी तो मेरे पिता की मृत्यु, कुरुक्षेत्र की रात, और वह ब्रह्मशिरा. सब शेष है. लेकिन उससे पहले जो मेरे पिता के साथ हुआ वो सुनो क्योंकि वही तो थी।

इस युद्ध की असली जननी. योगेश्वर अग्निवंश, तुमने मुझसे पूछा थाक्या प्रतिशोध पाप होता है?।

क्योंकि कुछ प्रतिशोध पाप नहीं होते. वे समय की माँग होते हैं. मेरे पिता, गुरु द्रोणाचार्य, ऐसे ही प्रतिशोध को वर्षों तक अपने भीतर जलाए रहे. वह आग जो शब्दों से शुरू हुई थीबहुत पहले की बात है.।

जब मैं जन्मा भी नहीं था. मेरे पिता और द्रुपद —दोनों एक ही आश्रम में पढे थे. दोनों ने एक ही गुरु के चरणों में बैठकर विद्या पाई थी. दोनों ने मित्रता की शपथ ली थी. द्रुपद तब राजकुमार था.।

मेरे पिता तब भी ब्राह्मण थे. द्रुपद ने तब कहा था—द्रोण! जब मैं राजा बनूँगा, तो आधा राज्य तेरा होगा. या फिर जब कभी तुझे मेरी जरूरत पडे तो मुझे याद कर लेना. ।

मेरे पिता ने उस वाक्य को कभी माँग नहीं बनाया. उन्होंने उसे मित्रता का विश्वास माना. पर समय बदला. जब मित्र राजा बन गयाराजा द्रुपद ने पंचाल का सिंहासन संभाल लिया. सोने–चाँदी से भरा दरबार, सेनाएँ, हाथी, घोडे —सब कुछ उसके पास था. ।

और मेरे पिता? वह तब भी एक निर्धन ब्राह्मण थे. पत्नी, बालक और तप —यही उनकी संपत्ति थी. कृपी के पास दूध नहीं था. मैं रोता था. मेरे पिता चुप रहते थे. ।

और तब. उन्होंने निर्णय लिया. द्रोणाचार्य का पंचाल जानामैं यह सब जानता हूँ, ।।

क्योंकि पिता ने मुझे बाद में बताया था.

वे पंचाल पहुँचे. वही मित्रता, वही विश्वास लेकर. दरबार में उन्होंने कहा द्रुपद! हम साथ पढे थे.

तुम्हारा वचन याद है?

राजा द्रुपद हँसा. वह हँसी. वह मेरे पिता के भीतर आज भी गूँजती है. द्रुपद ने कहा

मित्रता बराबरी में होती है, द्रोण. अब मैं राजा हूँ, और तुम एक दरिद्र ब्राह्मण.

दरबार ठहाकों से भर गया. अपमान जो खून से भी गहरा था मेरे पिता ने कुछ नहीं कहा. उन्होंने सिर झुकाया. और बिना एक शब्द बोले लौट आए. ।

पर उस दिन उनके भीतर एक अग्नि जन्मी. वह आग चीखती नहीं थी.


वह जलाती थी. उस दिन मेरे पिता ने प्रतिज्ञा ली मैं स्वयं राज्य नहीं लूँगा, पर जिस दिन शक्ति मेरे पास होगी,

उस दिन द्रुपद को उसकी औकात दिखाऊँगा. यह प्रतिज्ञा तलवार की नहीं थी.।

यह गुरु की प्रतिज्ञा थी. एक लंबा इंतजार प्रतिशोध की साधना जिसने इंतजार किया बस इंतजार ।

योगेश्वर, मेरे पिता अधीर नहीं थे.

उन्होंने तुरंत युद्ध नहीं किया. उन्होंने वर्षों प्रतीक्षा की. उन्होंने शिक्षा को अपना शस्त्र बनाया. उन्होंने राजकुमारों को योद्धा बनाया. कौरव, पांडव —वे केवल शिष्य नहीं थे.।

वे मेरे पिता की रणनीति थे. हर दिन, हर अभ्यास के साथ द्रुपद का अपमान उनको याद आता था

ओर उनके भीतर गहराता गया. शिक्षा पूर्ण हुई लेकिन उससे पहले कई घटनाएं भी घटी जो इस महाभारत युद्ध से जुडी है लेकिन अभी ये समझो वर्षों बाद वह दिन आया जब कौरव और पांडव पूर्ण योद्धा बन चुके थे.।

अर्जुन, जो पिता का प्रिय शिष्य था,


एक दिन उनके पास आया. उसने हाथ जोडकर कहा—गुरुदेव!

हमारी शिक्षा पूर्ण हुई. कृपा कर आज्ञा दें —हम आपकी गुरु दक्षिणा क्या दें?


उस क्षणमेरे पिता की आँखों में वह आग फिर जाग उठी. पर उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था.।

गुरु दक्षिणा की घोषणा मेरे पिता ने सभी शिष्यों को एकत्र किया. कौरव भी थे, पांडव भी. 

उन्होंने शांत स्वर में कहा—मेरी गुरु दक्षिणा सुनो.

सभी चौंक गए. राजकुमारों ने सोचा स्वर्ण, राज्य, धन? पर मेरे पिता ने कहा—

मुझे पंचाल का राजा द्रुपद चाहिए. सभा स्तब्ध हो गई. भीम ने मुट्ठी भींच ली. अर्जुन की आँखें चमक उठीं. दुर्योधन के होंठों पर हल्की मुस्कान आई. शिष्यों के भीतर उठता तूफानकुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोला. ।

फिर अर्जुन आगे बढा. उसने कहा

गुरुदेव! आपकी गुरु दक्षिणाहमारा धर्म है.

भीम ने कहा हम द्रुपद को बाँधकर लाएँगे. दुर्योधन ने भी तुरंत समर्थन किया. क्योंकि वह जानता था इस युद्ध में शक्ति दिखाने का अवसर है.

मैं — एक मौन साक्षी मैं सब देख रहा था. मुझे ज्ञात था यह केवल गुरु दक्षिणा नहीं है.।


यह वर्षों पुराने अपमान का उत्तर है. लेकिन कोई ये नहीं जानता था कि गुरु द्रोणाचार्य ने ये सब क्यों करने को कहा. लेकिन उन कौरवों ओर पांडु राजकुमारो में अर्जुन के मन में ये सवाल उभर आया लेकिन वो अभी इस सवाल का जवाब नहीं जानना चाहता था.

यह गुरु का न्याय है. मेरे पिता ने मेरी ओर देखा. उनकी आँखों में कोई क्रोध नहीं था. केवल निर्णय था.।


द्रुपद पर आक्रमण पहले कौरव गए. दुर्योधन, दुःशासन,  युद्ध किया. पर द्रुपद को बाँध न सके.

फिर पांडव गए. अर्जुन ने धनुष उठाया. और वही हुआ
जो मेरे पिता ने चाहा था. अर्जुन ने द्रुपद को पराजित किया. ।

उसे बंदी बनाकर लाया. मेरे पिता ने द्रुपद से कहा—अब हम बराबर हैं. ।

और उसके राज्य को दो भागों में बाँट दिया. आधा उसे लौटा दिया. क्योंकि गुरु प्रतिशोध में भी धर्म नहीं छोडता. योगेश्वर यह पहला युद्ध था. ।

जो बिना कुरुक्षेत्र के लडा गया.योगेश्वर, इसी दिन मैंने जाना गुरु जब चुप रहता है, ।
तो वह तैयारी कर रहा होता है.बस उसको समझने वाला ही समझ सकता है जैसे अर्जुन क्या अर्जुन अपने गुरु द्रोणाचार्य से ऐसा करने का कारण पूछेगा.

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लेखक भगवत सिंह नरूका