सभी रस्म बारी बारी से पुरी की जा रहीं थीं। आस पड़ोस की औरतों का गाना बजाना। ओर गीता का हस खेल कर बाते करना। लग रा था गीता मन ही मन बहुत ज्यादा खुश है।
वक्त का पता भी नहीं लग रहा था कहा भागे जा रहा था। मगर गीता अब भी अचरज में थी। की शादी का माहोल है मगर यह बस घर ही घर में है। आस पड़ोस की इन चार औरतों के अलावा किसी को कानों कान खबर क्यू नहीं हैं।
मगर जो भी हो गीता अब खुश थी। कम से कम उसकी शादी अब थोड़ी शादी सी लग रही थी।
मेहमानो का आना जाना बिल्कुल नहीं था। यहां तक की कोई सगा संबंधी भी नहीं आया।
ना ही लोगों के खाने पीने का इंतजाम।
"आखिर एक हलवाई आता है। "
मगर वो हलवाई इस लिए नहीं आया था की बारात का भोजन तयार करना था। वो बस बीस से तीस लोगों का खाना तयार करने वाला था। जिसकी बात पहले से तय हो चुकी थी।
ओर वह बस खाना बना कर भागने की तयारी के साथ आया था।
अब महिलाएं तो इस लिए हाथ नही बंटा सकती थी। क्यूकी वह गीता की साज सज्जा में लगी हुईं थी।
गीता के पिता। बाजार से कुछ एक आध बर्तन वगेरह लाए थे। गीता को देने के लिए। ओर कुछ जरूरत का सामान।
वैसे तो उन्होंने कुछ जमा ही नहीं किया था। मगर जो थोडा बहुत जमा किया भी था"(गीता की मां के कुछ कीमती गहने ही थे)"
धीरे धीर शाम ढलने को आती है ।
मेहंदी का रंग हाथों पर चढ़ चुका था। ओर इंतजार था तो बस बारात का।
खाना बन कर तयार था। गीता के पिता भी घर आ चूके थे। ओर वो भी बारात का इंतजार कर रहे थे।
तभी एक गाड़ी आकार रुकती है।
उसमे से गीता का होने वाला पति और उसके साथ एक दो उसके सगे संबंधी भी थे।
सारे रस्मों रिवाज विधि पूर्वक संपूर्ण किए जाते है। ओर यह सारे काम रात रात में ही पूरे कर लिए जाते हैं।
ना कोई शोर शराबा ना शादी जैसी धूम। बस चोरी चुपके सब निपटा लिया जाता है।
मां बाप के द्वारा नए कपडे पहन कर कन्यादान भी कर दिया जाता है।
गीता की विदाई में वह बहुत ही रोई थी।
मगर मुझे एक बात आज तक समझ नहीं आई। की आखिर गीता तो इस नर्क से निकलकर अपनी ज़िंदगी बनाने जा रही थी तब भी वो इतना क्यों रोई।
बर्तन तो वो पहले भी मांजती थी। ओर अब भी मांजने ही थे तो वो चुटकुला भी यहां फिट नहीं बैठ ता। की इस लिए रो रही लाड़ी की ये घर से लाकर अब बर्तन जो मंजवाएगा।
मगर इस रोने धोने के बीच में खूब खीच तान हुई। ओर आखिर कार गीता का विवाह संपन्न हुआ। गीता को कार में बिठा कर ले जाया जाता है। ओर दस मिनट बाद ही वापस ले आते है। मगर इस बार वो चुप थी।
तो वो पहले रोना क्या बस ड्रामा था।
वैसे नहीं,,,,वो एक ऐसा भाब था। जो शादी की बात चलने से लेकर विदाई पर बाहर आता हैं। दिल फूट फूट कर रोता है। अपने मां बाप का आंगन छोड़ने पर। जहा उसका बच्चन बीता। आज तक की ढेरों यादें। जो की अब यहां छूट रही थी।
""उसकी आंखों में सवाल होते है। की क्या में अपने ससुराल जाकर मेरी मां के जैसे सब संभाल पाऊंगी। ""
""क्या। में भी एक कुशल गृहणी बन पाऊंगी। ""
गीता को गाड़ी में ही छोड़ कर गीता का पति घर आता है और गीता के पिता से हिसाब किताब सम्पूर्ण करके। उनको रुपे देकर और आशीर्वाद लेकर अपने घर जाने को तयार हो जाता है।
दोनों का रास्ता बातों बातों में यूंही गुजर जाता है।
ओर यहां उसके घर पर काकी और कुछ एक आध औरतें गीता का स्वागत करने के लिए खड़ी होती है।
रस्मों और रिवाजों के साथ गीता का स्वागत किया जाता है।
ओर दो दिन इन्हीं रस्मों रस्मों में ही गुजर जाते है।
सारी अड़ोस पड़ोस की जितनी महिलाएं थी कुछ दिन तक शादी का सा माहौल होने की वजह से घर के कामों में हाथ बटांती है।
बाद में सारा भार गीता के कंधों पर ही आ जाता है।
गीता को गुजरे हुए कुछ दिनों में कुछ भी पता नहीं चल रहा था। ना खाने की चिंता न पानी की।
सब काम तयार मिल रहा था।
खाने की बारी आती तो गीता का पति बाजार से। ले आता।
उसने शादी के बाद एक भी दिन शराब को हाथ नहीं लगाया था।
ओर गीता को खुब सारा प्यार करता। उसे किसी चीज की कमी नहीं होने दे रहा था।
वक्त के साथ यहीं दिन,,,
कि गीता अब सब कुछ समझ रही थी। वहा के काम धाम कैसे सब संभालना है।
गीता धीरे धीरे काम में व्यस्त रहने लगीं और उसका पति अपने काम में।
मगर इन दो महीनों में गीता के पति का प्यार पहले जैसा ही रहा। ओर अब छोटी छोटी बातों पर झगड़ा होना शुरु हो गया था।
एक दो दिन और बीते इतने में गीता का पति शराब पी आया।
गीता ने समझाने की कोशिश की। मगर आदत से मजबूर वो गलियां देने लगा।
गीता ने सोचा भावनाओ का सहार लेकर कसम देने की कोशिश की। मगर गीता के जिस्म से अब उसका दिल भर चुका था। इन दो महीनों में उसने गीता को घर पर एक दिन भी अकेला नहीं छोड़ा था।
जब उसका सारा पैसा खत्म हो गया तब वह बाहर जाने लगा। ओर कमा कर एक भी रुपया घर नहीं देता।
धीरे धीरे उसका असली चेहरा सामने आ रहा था।
ओर कुछ आस पड़ोस की औरतों और लड़कियो से उसके कर्म कांड के बारे में जाना तो गीता को मन ही मन अफसोस होने लगा।
इससे अच्छा तो उसका पीहर ही था। मेने गलत ही अपनी ज़िंदगी इस जल्लाद के हाथों में सौंप दी है।
अब गीता का पति गीता पर बंदिशें लगाने लगा था। उसको घर पर दो बात नहीं करने देता था। ना ही उसको खुल कर जीने दे रहा था।
गीता कई बार भावनाओ मे बह जाती और आत्म हत्या करने का विचार उसके जेहन में आ जाता।
मगर वह हर बार असफल हो जाती।
To be continued............