An incomplete coffee shop meeting in Hindi Short Stories by Bharti 007 books and stories PDF | कॉफी शॉप की अधूरी मुलाकात

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कॉफी शॉप की अधूरी मुलाकात



बारिश उस दिन कुछ ज़्यादा ही ठहरकर बरस रही थी, जैसे शहर को नहीं—
अन्वी के दिल को भिगोना चाहती हो।

कॉफ़ी हाउस की खिड़की के पास वही पुरानी टेबल…जहाँ कभी दो कप चाय,
और अनगिनत सपने रखे जाते थे, अन्वी पिछले छह सालों से जब वो कॉलेज में थी तब से वो किसी खास इंसान जो दोस्त से बढ़कर था उसके साथ यहां  आया करती है और यह सिलसिला जारी है दोस्ती और वो खास दोस्त पीछे छूट गए लेकिन  अन्वी अपने पुरानी यादों को ताजा करने या उस खास  दोस्त के इंतजार में अन्वी ने अपनी शॉल ठीक की और घड़ी देखी— शाम के छह बजकर दस मिनट...“ आज भी वो नहीं आएगा…” उसने खुद से कहा, लेकिन दिल ने यक़ीन मानने से इनकार कर दिया।

तभी ..दरवाज़े पर हलचल हुई और अन्वी की धड़कन एक पल को रुक गई ,काले रंग का कोट, भीगे बाल,और आँखों में वही ठहरी हुई उदासी—
अनिरुद्ध वक़्त जैसे पीछे लौट गया,
अनिरुद्ध ने उसे देखा…और बस देखता ही रह गया , कुछ लोग बदलते नहीं,
बस ज़्यादा चुप हो जाते हैं ,“हाय…”
उसकी आवाज़ धीमी थी, पर असर सीधा दिल पर।

“हाय…” अन्वी ने भी कहा,और नज़रें झुका लीं , दोनों बैठ गए ,बीच में टेबल थी,
पर असल फ़ासला दिलों के बीच था।

वेटर आया— “क्या लेंगे मैडम..??
अन्वी कुछ बोल पाती,
उससे पहले अनिरुद्ध ने कहा - “एक इलायची  अदरक वाली चाय।

अन्वी ने उसकी तरफ़ देखा,
“तुम्हें अब भी याद है..??

अनिरुद्ध हल्का सा मुस्कुराया ,
“कुछ बातें भुलाने की कोशिश की थी…
पर दिल ने साथ नहीं दिया, ख़ामोशी फिर लौट आई दोनों के बीच और बाहर
बारिश की आवाज़, चम्मच की खनक,
और दिलों का शोर 

“तुम अचानक कैसे..?? अन्वी ने पूछा,
अन्वी के हाथ में वही  गुलाबी डायरी  थी
जिसमें  कुछ पंक्तियां जज़्बातों से भरी है ,

अनिरुद्ध मुस्कुरा कर उसके हाथ से वो डायरी लिया और डायरी का पहला पन्ना खोला , जिसमें लिखा था—
“प्यार कभी खत्म नहीं होता,
बस लोग डर जाते हैं…”उसकी आँखें नम हो गई “क्या मैं डर गया था, अन्वी..??
उसने धीमे से पूछा, अन्वी ने खिड़की के बाहर देखते बोली,“शायद…
और मैंने इंतज़ार करना सीख लिया है।

चाय आ चुकी थी, भाप उठ रही थी—
बिल्कुल उन एहसासों की तरह,
जो फिर से ज़िंदा हो रहे थे।

अनिरुद्ध उसका हाथ छू लिया ,
एक पल के लिए,अन्वी ने हाथ नहीं हटाया,
हवा ठंडी थी, पर उनके बीच का सन्नाटा उससे भी ठंडा ,अन्वी चुप थी।

"कुछ रिश्ते इतने नाज़ुक होते हैं कि एक शब्द ज़्यादा हो जाए,
तो सब टूट जाए…और एक शब्द कम रह जाए, तो सब अधूरा ,“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाना चाहता था…” आख़िरकार अनिरुद्ध ने कहा।

अन्वी का हाथ काँप गया ,
“तो फिर गए क्यों थे, अनि..??
उसने पहली बार उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।


“क्योंकि उस वक़्त मैं तुम्हारे लायक नहीं था,”(अनिरुद्ध ने कहा).. “मेरे पास सपने थे,
पर हिम्मत नहीं।

अन्वी की आँखें भर आईं,
“और मैंने सोचा…कि शायद मैं तुम्हारे सपनों में फिट नहीं बैठती।

अनिरुद्ध चौंक गया, “ऐसा कभी नहीं था…”

“लेकिन तुम्हारी ख़ामोशी ने मुझे यही सिखाया,”(अन्वी ने रुंधे गले से बोली)


“तुम्हारी ये डायरी…“क्या इसमें जो लिखा है वो मेरे लिए है..?? अनिरुद्ध ने एक पन्ने पलट कर देखा,उस पन्ने में तारीख़ लिखी थी
तीन साल पहले की उसने पढ़ा—
“आज अनि ने कुछ नहीं कहा,
लेकिन उसकी चुप्पी ने बहुत कुछ कह दिया, अगर वो लौटेगा, तो मैं शिकायत नहीं करूँगी… बस पूछूँगी—
क्या अब रुक पाओगे..??

अनिरुद्ध की आँखों से आँसू गिर पड़े,
“मैं लौट आया हूँ, अन्वी…(उसने कहा)
“लेकिन डरता हूँ, कि कहीं देर न हो गई हो।

अन्वी ने उसकी तरफ़ देखा, उस नज़र में नाराज़गी नहीं थी ,“देर तब होती है,“जब एहसास मर जाएँ ,मेरे एहसास अब भी ज़िंदा हैं…”

अनिरुद्ध ने उसका हाथ थाम लिया,
इस बार ज़्यादा मज़बूती से,“तो क्या मुझे एक मौका मिलेगा..?? उसने पूछा।

अन्वी ने हल्की मुस्कान के साथ
अपना हाथ नहीं छुड़ाया,
“मौका नहीं, अनि…“इस बार वक़्त दूँगी,
क्योंकि प्यार भरोसे से नहीं,सब्र से मजबूत होता है।

बारिश अब थमने लगी थी और आसमान की तरह, उनके दिलों में भी हल्की-सी रोशनी उतर आई थी, पुराने ज़ख़्म अब भी थे…
लेकिन उनके बीच नई उम्मीद सांस लेने लगी थी। 



दिन बीतने लगे..
शहर अपने पुराने रफ़्तार में लौट आया, अनिरुद्ध रोज़ मैसेज करता,
कभी सुबह की “गुड मॉर्निंग”,
तो कभी रात की “तुम ठीक हो..??

अन्वी जवाब देती…लेकिन हर जवाब थोड़ा संभला हुआ, थोड़ा डरा हुआ होता,
एक शाम अनिरुद्ध  ने पूछा,“कहीं चलें?
उसने मुस्कुराते हुए पूछा।

अन्वी हिचकी ,“आज नहीं…
थोड़ा काम है।

अनिरुद्ध ने मुस्कान छुपा ली,
“ठीक है… फिर कभी, वो फोन रख दिया, लेकिन अन्वी की नजरें देर तक फोन पर अनिरुद्ध की तस्वीर देखती रही , फिर उसने गुलाबी डायरी फिर खोली — “वो पास है, फिर भी दूर लगता है, शायद मैं अब भी डरती हूँ… कि कहीं फिर अकेली न रह जाऊँ।

दूसरी तरफ़ .. अनिरुद्ध भी अपने कमरे में
खिड़की से बाहर देख रहा था,
तीन साल पहले की वही गलती,
वही ख़ामोशी— वो दोहराना नहीं चाहता था, लेकिन अन्वी की दूरी उसे बेचैन कर रही थी।

अगले दिन
अनिरुद्ध ने उसे कॉल किया,
“अन्वी…क्या हम बात कर सकते हैं??
उसने गहरी साँस ली।

“हाँ… बोलो..??

“मुझे ऐसा लग रहा है ,जैसे मैं फिर तुम्हें खो रहा हूँ, (अनिरुद्ध ने साफ़ कहा)

अन्वी चुप रही..!!

“अगर तुम्हें वक़्त चाहिए, तो मैं दूँगा,”उसने आगे कहा, “लेकिन तुम्हारी ख़ामोशी आंखें…मुझे डरा रही है।

अन्वी की आँखें भर आईं, “मैं तुमसे दूर नहीं जाना चाहती, अनि..बस इस बार
खुद को बचाना चाहती हूँ।


अनिरूद्ध की आवाज़ नरम हो गई,
“और मैं… तुम्हें खोने से डरता हूँ,
दोनों के बीच पहली बार सच
पूरी तरह सामने था!!

कुछ पल बाद

अन्वी ने कहा ,“कल वही कॉफ़ी हाउस…
शाम छह बजे,

अनिरुद्ध की धड़कन तेज़ हो गई,
“मैं आऊँगा, फोन कट गया, खिड़की के बाहर शाम ढल रही थी, और उनके दिलों में
चाहत और शक एक-दूसरे से टकरा रहे थे।

वही कॉफ़ी हाउस,
वही खिड़की के पास वाली टेबल,और वही शाम—लेकिन इस बार हवा में एक अलग-सी बेचैनी थी, अन्वी पहले आ गई थी, उसके सामने गुलाबी डायरी खुली थी,
लेकिन नज़रें शब्दों पर नहीं टिक रहीं थीं, फिर दरवाज़े पर हलचल हुई...!!

अनिरूद्ध अंदर आया , बिजनेस सूट पहने ,वो अपने खानदान के बिजनेस संभाल रहा था , परिवार के दबाव में वो अपने दिल की बात घरवालों को नहीं बताया था ..,आज उसके क़दमों में हिचक नहीं थी—बस एक फैसला था, वो सामने बैठा।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा,जैसे इस बार नज़रें हटाना मुमकिन ही न हो ,
“तुम कुछ कहना चाहती हो??
अनिरूध ने धीरे से कहा।

अन्वी ने डायरी बंद की,
“नहीं… आज मैं सुनना चाहती हूँ।

अनिरूध ने गहरी साँस ली ,
“तीन साल पहले मैं तुम्हारे सामने खड़ा होकर भी तुमसे भाग गया था ,क्योंकि मुझे डर था कि मैं तुम्हें वो ज़िंदगी नहीं दे पाऊँगा
जिसकी तुम हक़दार हो, उसकी आवाज़ काँप गई, “लेकिन आज,”
उसने आँखों में आँखें डालकर कहा,
“मुझे उस डर से भी ज़्यादा आज तुम्हें खोने का डर है।

अन्वी की पलकों पर आँसू झिलमिला गए।।

“मैं परफेक्ट नहीं हूँ, (अनिरुद्ध ने आगे कहा)
“मैं अब भी सीख रहा हूँ…लेकिन अगर तुम चाहो, तो मैं हर रोज़ तुम्हारे साथ सीखना चाहता हूँ।

कॉफ़ी हाउस का शोर जैसे कहीं दूर चला गया,
अन्वी ने पहली बार दिल से मुस्कुराकर कहा— “मुझे बड़े वादे नहीं चाहिए थे, अनिरुद्ध…बस तुम्हारा साथ चाहिए..


अनिरूद्ध ने उसका हाथ थाम लिया ,
इस बार कोई झिझक नहीं थी ,“मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हुं, और हर मुश्किल में,
हर डर के सामने भी!!

अन्वी की आँखों से आँसू गिर पड़े ,
लेकिन ये आँसू दुख के नहीं थे ,
“मैं तुमसे अब भी प्यार करती हूँ,”
उसने पहली बार कहा “लेकिन इस बार ,मैं कोई समझौता नहीं करूँगी।”

अनिरूद्ध ने सिर हिलाया,“और मैं तुम्हें
खुद से दूर नहीं होने दूँगा।

बाहर शाम पूरी तरह उतर चुकी थी,
खिड़की के शीशे पर दो परछाइयाँ
एक-दूसरे के क़रीब झुक गईं,
उस पल ना कोई शक था, ना दूरी—
बस दो दिल जो सच बोल चुके थे।

उस शाम के बाद अब हर मुश्किल में
एक-दूसरे का साथ अन्वी और अनिरुद्ध 
धीरे-धीरे फिर से एक-दूसरे की आदत बन रहे थे—बिना जल्दबाज़ी,
बिना डर , सुबह की पहली चाय,
दिन के छोटे-छोटे मैसेज,
और रात को लंबी बातें— सब कुछ नया था।

एक रविवार अनिरुद्ध ने अन्वी को
शहर से दूर एक छोटी-सी झील में ले आया 
आसमान साफ़ था, पानी में सूरज की परछाई हल्के-हल्के हिल रही थी।

अन्वी चुपचाप बैठ गई , अनिरूद्ध उसके पास बैठा था, “तुम्हें याद है, तुम कहा करती थीं ,प्यार वो नहीं जो बांध ले, प्यार वो है
जो थामे रखे।

अन्वी मुस्कुरा दी, “और तुम कहते थे ,
जब डर लगे, तो सच बोल देना चाहिए ,
अनिरूद्ध ने उसकी तरफ़ देखा ,
आज उसकी आँखों में कोई डर नहीं था,
“अन्वी,”
उसने शांत आवाज़ में कहा,
“मैं तुम्हारे साथ हर दिन चुनना चाहता हूँ।
भागकर नहीं, ठहरकर।

अन्वी की साँस रुक गई..

“मुझे नहीं पता आगे क्या होगा ?? (आरव ने आगे कहा) “लेकिन अगर तुम मेरा हाथ थाम लो, तो हर रास्ता आसान लगने लगता है।

अन्वी ने कुछ पल सोचा , तीन साल का इंतज़ार, आँसू, डर , सब आँखों के सामने घूम गए, फिर उसने अपना हाथ
धीरे से अनिरुद्ध के हाथ में रख दिया।
“मैं भी यही चाहती हूँ।।


“पर इस बार हम वादा नहीं करेंगे…
बस निभाएँगे ..
झील की सतह पर हवा की एक हल्की लहर उठी।
अनिरूद्ध उसकी पेशानी पर हल्का सा चुंबन दिया ,कोई दावा नहीं,बस अपनापन से !!
शाम ढल रही थी और उसी ढलती रोशनी में

समाप्त 

(पाठकों ऐसी ही छोटी-छोटी  प्रेम कहानी पढ़ने के लिए मुझे फ़ॉलो करें और कमेंट कीजिए - धन्यवाद 🙏)