शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में कबीर खुद को एक सुलझा हुआ इंसान समझता था, लेकिन सच तो यह था कि वह अपनी उलझनों को सलीके से तह करके रखने का आदी था। कबीर एक एड एजेंसी में क्रिएटिव डायरेक्टर था, जिसका काम था लोगों को सपने बेचना, जबकि उसकी अपनी जिंदगी में सपनों के नाम पर बस एक अच्छी नींद की हसरत बची थी। दूसरी तरफ थी मायरा, जो एक फ्रीलांस फोटोग्राफर थी और जिसका मानना था कि दुनिया की हर चीज को एक अलग एंगल से देखा जाना चाहिए, खासकर तब जब वह चीज कबीर की नाक के नीचे हो।
इन दोनों की मुलाकात एक कॉफी शॉप में हुई, जो किसी फिल्मी सीन जैसी बिल्कुल नहीं थी। कबीर अपनी ब्लैक कॉफी का इंतजार कर रहा था और मायरा अपने भारी-भरकम कैमरे के साथ काउंटर पर टकरा गई।
अरे! संभल के, मेरा लैपटॉप गिर जाता अभी। कबीर ने झुंझलाते हुए कहा।
मायरा ने अपना कैमरा बैग सीधा किया और उसे घूरते हुए बोली, गिर जाता ना, गिरा तो नहीं? वैसे भी, आप इतनी सुबह इतनी कड़वी कॉफी पिएंगे तो चेहरे पर ऐसी ही कड़वाहट रहेगी। थोड़ा मुस्कुराइए, टैक्स नहीं लगता।
कबीर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। बिखरे बाल, रंग-बिरंगा स्कार्फ और आंखों में एक अजीब सी शरारत। उसने ठंडी सांस ली और कहा, मुझे लगा था कि सुबह-सुबह शांति मिलेगी, पर लगता है कि आज नसीब में पंगे ही लिखे हैं।
नसीब का तो पता नहीं, पर आपकी कॉफी ठंडी हो रही है। मायरा ने मुस्कुराते हुए अपनी हॉट चॉकलेट उठाई और पास वाली टेबल पर जाकर बैठ गई।
अगले कुछ हफ्तों तक यह सिलसिला चलता रहा। वही कॉफी शॉप, वही वक्त और वही तकरार। कबीर को धीरे-धीरे मायरा की बेबाकी पसंद आने लगी थी, हालांकि वह इसे कभी कबूल नहीं करता। एक दिन ऑफिस के काम से कबीर बहुत परेशान था। उसके क्लाइंट को एक ऐसी फोटो चाहिए थी जो सादगी और खुशी दोनों बयां करे, पर उसे कुछसमझ नहीं आ रहा था।
मायरा ने उसे सिर पकड़कर बैठे देखा तो अपनी चेयर खींचकर उसके पास आ गई। क्या हुआ मिस्टर सीरियस? आज दुनिया डूबने वाली है क्या?
कबीर ने बिना सिर उठाए कहा, काम का प्रेशर है मायरा। क्लाइंट को कुछ अलग चाहिए, पर मेरे पास कोई आईडिया नहीं है।
मायरा ने उसका लैपटॉप अपनी तरफ घुमाया और बोली, आईडिया दिमाग में नहीं, गलियों में होते हैं। चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें दिखाती हूं कि असली खुशी क्या होती है।
कबीर कुछ बोल पाता, उससे पहले ही मायरा ने उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचकर बाहर ले गई। वे पुराने शहर की तंग गलियों में पहुंचे। वहां की खुशबू, लोगों का शोर और हर कोने में छिपी एक कहानी देखकर कबीर दंग रह गया।
मायरा ने एक पुरानी दुकान के पास रुककर कहा, देखो उस बूढ़े आदमी को, जो अपने पोते के लिए खिलौना खरीद रहा है। उसकी आंखों की चमक देखो। वह है तुम्हारी सादगी और खुशी।
कबीर ने उस पल को कैमरे में कैद होते देखा और उसे महसूस हुआ कि वह वाकई जिंदगी को बहुत संकुचित नजरिए से देख रहा था। उसने मायरा की तरफ देखा और कहा, तुम वाकई कमाल हो। मैंने कभी इस तरह सोचा ही नहीं था।
मायरा ने मजाक में कहा, तारीफ के पैसे लगेंगे, या फिर कम से कम एक प्लेट गरमा-गरम परांठे।
दोनों एक मशहूर परांठे वाली गली में जा बैठे। कबीर जो अपनी सेहत को लेकर बहुत सचेत रहता था, आज मक्खन से लथपथ परांठे देखकर थोड़ा झिझका।
खाइए भी! कल जिम में एक्स्ट्रा पसीना बहा लेना, आज तो बस स्वाद लीजिए। मायरा ने एक बड़ा निवाला तोड़ते हुए कहा।
कबीर ने परांठा चखा और उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। तुम हमेशा इतनी खुश कैसे रहती हो?
मायरा थोड़ी गंभीर हुई और बोली, क्योंकि दुखी रहने के लिए पूरी उम्र पड़ी है, खुश रहने के लिए बस आज का दिन है। वैसे, तुम्हारी मुस्कान उतनी बुरी नहीं है जितनी तुम्हारी चॉइस ऑफ कॉफी।
कबीर हंस पड़ा। यह पहली बार था जब वह खुलकर हंसा था। उस शाम के बाद उनके बीच की कड़वाहट पूरी तरह खत्म हो गई और उसकी जगह एक मीठी दोस्ती ने ले ली। लेकिन जहां प्यार होता है, वहां पंगा भी होता है।
एक हफ्ते बाद, कबीर के ऑफिस में एक बड़ी प्रेजेंटेशन थी। उसने मायरा की खींची हुई कुछ तस्वीरों को इस्तेमाल करने की इजाजत मांगी थी। लेकिन गलती से उसके असिस्टेंट ने उन तस्वीरों को बिना क्रेडिट दिए ही क्लाइंट को भेज दिया। जब मायरा को यह पता चला, तो उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
वह सीधा कबीर के ऑफिस पहुंची और चिल्लाते हुए बोली, तो यह थी तुम्हारी दोस्ती? मेरी मेहनत को अपना नाम देकर बेचना चाहते थे?
कबीर हैरान रह गया। मायरा, मेरी बात तो सुनो। यह एक गलती है, मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया।
गलती? तुम जैसे कॉर्पोरेट लोगों के लिए दूसरों की भावनाएं सिर्फ एक प्रोजेक्ट होती हैं। मुझे लगा था कि तुम अलग हो, पर तुम भी वही निकले। मायरा ने अपनी आंखों में आए आंसुओं को छुपाया और वहां से चली गई।
कबीर को अपनी गलती का एहसास था, भले ही उसने वह जानबूझकर नहीं की थी। उसने अगले दो दिन मायरा को फोन किया, मैसेज किए, पर कोई जवाब नहीं मिला। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उसे कैसे मनाए। तभी उसे एक आईडिया आया।
उसने मायरा की पसंदीदा जगहों पर जाकर छोटी-छोटी वीडियो क्लिप्स बनाईं। उसने उसी कॉफी शॉप के वेटर से लेकर उस परांठे वाले तक से बात की और सबसे एक ही बात कहलवाई— कबीर को माफ कर दो।
तीसरे दिन, जब मायरा अपने घर की बालकनी में खड़ी थी, उसने देखा कि नीचे एक बड़ा सा पोस्टर लगा है जिस पर लिखा था— मायरा, मेरी लाइफ की एक्सपोजर सेटिंग्स तुम्हारे बिना खराब हो गई हैं। क्या तुम इस बदकिस्मत डायरेक्टर को एक और टेक दोगी?
मायरा नीचे आई तो देखा कबीर हाथ में एक बड़ा सा बुके और एक नया कैमरा लेंस लिए खड़ा था। उसके पास एक छोटा सा बोर्ड भी था जिस पर लिखा था— आई एम सॉरी, विदाउट एनी फिल्टर।
मायरा ने उसे देखते ही अपनी बाहें सिकोड़ लीं। तुम्हें लगता है यह सब ड्रामा काम करेगा?
कबीर ने मासूमियत से कहा, ड्रामे का तो पता नहीं, पर अगर तुमने माफ नहीं किया तो मैं यहीं बैठकर तब तक परांठे खाऊंगा जब तक मेरा पेट ना फट जाए। और तुम्हें पता है, मुझे कोलेस्ट्रॉल से कितना डर लगता है।
मायरा की हंसी छूट गई। तुम सच में पागल हो कबीर।
पागल तो मैं हूं, पर सिर्फ तुम्हारे लिए। कबीर ने उसके करीब आकर कहा। देखो मायरा, मैंने क्लाइंट से बात कर ली है। तुम्हारी तस्वीरों को ना सिर्फ क्रेडिट मिलेगा, बल्कि उन्हें इस कैंपेन का मुख्य चेहरा बनाया जाएगा। पर उससे भी जरूरी मेरे लिए तुम हो।
मायरा ने उसकी आंखों में देखा। वहां कोई बनावट नहीं थी, बस एक सच्ची तड़प थी। उसने लेंस हाथ में लिया और बोली, अगली बार अगर ऐसी गलती हुई, तो मैं तुम्हारा ऐसा फोटो खींचूंगी कि तुम खुद को पहचान नहीं पाओगे।
कबीर ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ पकड़ लिया। मंजूर है। पर अब चलें? मुझे बहुत जोर से भूख लगी है।
कहां? मायरा ने पूछा।
वहीं, जहां मक्खन वाले परांठे मिलते हैं और जहां मेरी फोटोग्राफर दोस्त मुझे जिंदगी जीना सिखाती है। कबीर ने उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा।
दोनों उस भीड़भाड़ वाले शहर की सड़कों पर एक साथ चल दिए। उनके बीच अब कोई गलतफहमी नहीं थी, बस एक प्यारा सा रिश्ता था जिसमें थोड़ी नोक-झोंक थी, थोड़ा गुस्सा था और ढेर सारा प्यार।
कबीर को समझ आ गया था कि जिंदगी परफेक्ट होने की जरूरत नहीं है, बस उसमें एक ऐसा इंसान होना चाहिए जो आपकी कमियों को भी खूबसूरती से कैप्चर कर सके। और मायरा को मिल गया था एक ऐसा साथी, जो उसकी बेतरतीब दुनिया में एक सुकून भरा फ्रेम बन गया था।
कॉफी शॉप में आज भी कबीर ब्लैक कॉफी ही पीता था, पर अब उसमें कड़वाहट नहीं थी, क्योंकि सामने बैठी मायरा अपनी हॉट चॉकलेट से उसके जीवन में मिठास भर देती थी। प्यार और पंगे का यह सफर अब एक नई कहानी लिख रहा था, जिसमें हर दिन एक नया रोमांच और हर शाम एक नई मुस्कुराहट थी।