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कहानी: "लोहड़ी
✍️ लेखक: विजय शर्मा एरी
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प्रस्तावना
जनवरी की ठंडी रातें पंजाब की मिट्टी पर अपनी पूरी ताक़त से उतरती हैं। खेतों में सरसों के फूल पीले रंग से धरती को सजाते हैं, गन्ने की मिठास हवा में घुलती है। ऐसे समय में गाँव-गाँव में अलाव जलते हैं और लोग लोहड़ी का पर्व मनाते हैं। यह केवल फसल का उत्सव नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट और सामूहिकता का प्रतीक है।
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पहला दृश्य: गाँव सुखपुरा की हलचल
गाँव सुखपुरा में लोहड़ी की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं।
- महिलाएँ तिल और गुड़ से लड्डू बना रही थीं।
- बच्चे गन्ने की बंडियाँ उठाकर चौपाल तक ला रहे थे।
- बुज़ुर्ग चौपाल में बैठकर पुरानी कहानियाँ सुना रहे थे।
बच्चों के स्वर गूँज रहे थे—
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सुंदर मुंदरिये हो!
तेरा कौन विचारा हो,
दुल्हा भट्टी वाला हो...
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गाँव के मास्टर हरनाम सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा—
“देखो, यह गीत हमें याद दिलाता है कि हमारी परंपरा में वीरता और न्याय की कितनी अहमियत है।”
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दूसरा दृश्य: अमन और उसकी दादी
अमन, जो शहर से पढ़ाई करके लौटा था, अपनी दादी के साथ बैठा था।
“दादी, ये सब पुराना हो गया है। अब मशीनें खेतों में काम करती हैं, मंडी में फसल बिक जाती है। लोहड़ी का क्या मतलब?”
दादी ने उसकी आँखों में देखा और कहा—
“बेटा, त्योहार केवल खेती-बाड़ी का नहीं होता। यह हमें जोड़ता है। जब सब मिलकर आग के चारों ओर बैठते हैं, तो रिश्तों की ठंडक मिटती है। लोहड़ी की आग हमें याद दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं।”
अमन चुप हो गया। उसके मन में सवाल उठे, लेकिन दादी की बातों ने कहीं न कहीं दिल को छू लिया।
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तीसरा दृश्य: गाँव में नया रिश्ता
इस बार लोहड़ी का उत्सव खास था। सरपंच की बेटी की शादी तय हुई थी। पूरे गाँव ने तय किया कि इस बार लोहड़ी का अलाव सरपंच के आँगन में होगा।
लोगों ने कहा—
“लोहड़ी की आग में हम सब मिलकर नए रिश्ते की शुरुआत को आशीर्वाद देंगे।”
गाँव की औरतें गीत गा रही थीं, बच्चे नाच रहे थे। हर घर से गन्ने, रेवड़ी और मूँगफली सरपंच के आँगन में पहुँच रही थी।
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चौथा दृश्य: दुल्ला भट्टी की कथा
लोहड़ी की रात आई। अलाव जलाया गया। लोग गीत गा रहे थे। तभी मास्टर हरनाम सिंह ने सबको दुल्ला भट्टी की कथा सुनाई।
“दुल्ला भट्टी पंजाब का वीर था। उसने मुग़लों के अत्याचार से लड़कियों को बचाया और उनकी शादियाँ करवाईं। लोहड़ी के गीतों में उसका नाम इसलिए आता है, क्योंकि वह न्याय और साहस का प्रतीक है।”
अमन ध्यान से सुन रहा था। उसे लगा कि यह केवल कहानी नहीं, बल्कि साहस और सामाजिक ज़िम्मेदारी का संदेश है।
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पाँचवाँ दृश्य: अमन का परिवर्तन
अलाव के चारों ओर लोग घूम रहे थे। अमन ने देखा कि गाँव के गरीब परिवारों को भी मिठाइयाँ और गन्ने बाँटे जा रहे हैं। बच्चे हँस रहे थे, बुज़ुर्ग आशीर्वाद दे रहे थे।
अमन ने सोचा—
“शहर में तो लोग अपने-अपने घरों में बंद रहते हैं। यहाँ लोहड़ी सबको जोड़ रही है। यही तो असली अर्थ है।”
उसने दादी का हाथ पकड़कर कहा—
“दादी, अब मुझे समझ आया। लोहड़ी केवल फसल का त्योहार नहीं, यह दिलों को जोड़ने का पर्व है।”
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छठा दृश्य: भावनात्मक चरम
अलाव की लपटें आसमान छू रही थीं। लोग गा रहे थे, नाच रहे थे। अमन ने पहली बार महसूस किया कि आग की गर्माहट केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी गरमाती है।
उसने अपने दोस्तों से कहा—
“हम सबको यह परंपरा आगे बढ़ानी चाहिए। लोहड़ी हमें सिखाती है कि चाहे समय कितना भी बदल जाए, रिश्तों की गर्माहट कभी पुरानी नहीं होती।”
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सातवाँ दृश्य: गाँव की एकता
लोहड़ी की रात गाँव के लिए एक उत्सव से बढ़कर थी।
- गरीब और अमीर सब एक साथ बैठे थे।
- बच्चों की हँसी और बुज़ुर्गों की दुआएँ मिलकर एक संगीत बना रही थीं।
- सरपंच की बेटी की शादी की खुशी सबके चेहरों पर झलक रही थी।
अमन ने महसूस किया कि यह त्योहार केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सामूहिकता का प्रतीक है।
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उपसंहार
रात गहरी हो गई थी। अलाव की राख ठंडी होने लगी थी। लेकिन अमन के दिल में एक नई आग जल चुकी थी—अपनी संस्कृति को समझने और आगे बढ़ाने की आग।
लोहड़ी का पर्व उसके लिए अब केवल गन्ने और रेवड़ी का नहीं रहा, बल्कि जीवन की मिठास और सामूहिकता का प्रतीक बन गया।
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कहानी का सार
- लोहड़ी केवल फसल का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट और सामाजिक जुड़ाव का पर्व है।
- दुल्ला भट्टी की कथा हमें साहस और न्याय की याद दिलाती है।
- अमन जैसे युवाओं के लिए यह त्योहार अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर है।
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