एक दिन देर शाम तक दोनों ऑफिस में ही थे।काम खत्म होने के बाद अर्शित ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—“मिस शर्मा, मुझे आप पर भरोसा था… और आज लग रहा है कि मेरा भरोसा बिल्कुल सही जगह लगाया गया था।”सिया ने पहली बार खुलकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया—“सर, यह सब आपकी वजह से है। अगर आपने मुझ पर भरोसा न किया होता, तो शायद मैं आज भी डर में जी रही होती।”उस पल सिया को एहसास हुआ—जयपुर ने उसे सिर्फ़ नई नौकरी नहीं दी थी,बल्कि खुद पर भरोसा करना भी सिखाया था।और यही उसकी ज़िंदगी की असली शुरुआत थी…सिया अब पहले जैसी सहमी हुई लड़की नहीं रही थी। जिम्मेदारियों के साथ उसका आत्मविश्वास भी बढ़ रहा था। अर्शित अक्सर उसे दूर से देखता—मीटिंग में उसका शांत रवैया, काम के प्रति समर्पण, और आँखों में झलकती ईमानदारी।दिन बीतने लगे।कभी देर रात तक प्रोजेक्ट पर काम होता, तो कभी कॉफी ब्रेक में हल्की-फुल्की बातें। अर्शित को सिया की समझदारी, उसका धैर्य और उसकी चुप-सी मुस्कान अच्छी लगने लगी।और सिया…सिया को पहली बार कोई ऐसा इंसान मिला था, जो बिना सवाल किए उसकी बात समझ लेता था।एक दिन क्लाइंट मीटिंग के बाद सिया देर रात तक ऑफिस में ही रुकी रही।फाइलें समेटते हुए उसने घड़ी देखी, समय का एहसास ही नहीं हुआ था।अर्शित उसके केबिन के पास रुका और बोला—“इतनी देर तक काम करना ठीक नहीं है। कभी-कभी खुद के लिए भी वक्त निकालना चाहिए।”सिया थोड़ी झिझकी, फिर बोली—“आदत नहीं है सर… ज़िंदगी ने सिखाया है कि अगर ढील दी, तो सब छिन जाता है।”उसके शब्दों में दर्द था।अर्शित कुछ पल चुप रहा, फिर धीरे से बोला—“अब आप अकेली नहीं हैं, सिया। यहाँ आप सुरक्षित हैं।”सिया के दिल ने एक अजीब-सी हलचल महसूस की। उस दिन दोनों के बीच देर रात तक बातें हुई।एक दिन अचानक ऑफिस के काम से दोनों को साथ बाहर जाना पड़ा। मीटिंग के बाद सब लोग घर जा रहे थे, अर्शित भी अपनी कार के साथ बाहर निकला अचानक बहुत तेज बारिश होने लगी।ऑफिस से निकलते वक्त सिया को पता चला कि उसकी कैब कैंसिल हो गई है। वह परेशान होकर खड़ी थी, तभी अर्शित ने कार रोक दी।“अगर आप चाहें, तो मैं छोड़ दूँ,” उसने सहजता से कहा।सिया पहले तो हिचकिचाई लेकिन फिर वो कार में बैठ गई। सिया खिड़की से बाहर देख रही थी — तेज बारिश की बूँदें जैसे उसकी पुरानी तकलीफ़ें धो रही हों। सिया खुद में ही मुस्कुरा रही थी।और अर्शित भी चुप - चाप बस सिया को महसूस कर रहा था।रास्ते भर दोनों चुप रहे।“आप बहुत बदल गई हैं,” अर्शित ने अचानक कहा।“पहले आपकी आँखों में डर था, अब… उम्मीद है।”सिया ने पहली बार उसे सीधे देखा।धीमी आवाज़ में बोली—“कभी-कभी हालात इंसान को तोड़ नहीं, तराश देते हैं।”अर्शित कुछ पल उसे देखता रहा। उस पल उसे एहसास हुआ—वह सिर्फ़ एक एम्प्लॉयी नहीं थी।वह एक ऐसी लड़की थी, जिसने चुपचाप बहुत कुछ सहा था और अब खुद को फिर से जीना सीख रही थी।अचानक सिया ने कहा—“सर… आपने कभी नहीं पूछा कि मैं जयपुर क्यों आई।”अर्शित ने सड़क से नज़र हटाए बिना जवाब दिया—“क्योंकि जब कोई खुद बताना चाहता है, तब सवालों की ज़रूरत नहीं होती।”सिया की आँखें भर आईं।उसने महसूस किया—अर्शित उसे समझने की कोशिश कर रहा था, बदलने की नहीं।उस रात सिया देर रात तक सो नहीं पाई।उसके दिमाग में बार-बार वही आवाज़ गूंज रही थी—“अब आप अकेली नहीं हैं।”और उधर अर्शित भी पहली बार खुद से सवाल कर रहा था—क्या यह सिर्फ़ जिम्मेदारी थी…उस दिन के बाद दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बनने लगा।न नाम था, न इकरादोनों ही अपने-अपने एहसासों से अनजान थे,मगर किस्मत चुपचाप उनके बीच एक रिश्ता बुन रही थी… 🌧️❤️अगली सुबह जब अर्शित ऑफिस पहुंचा उसने देखा सिया पहले से ऑफिस में थी , वो सिया के पास गया और बोला— " क्या बात है मिस शर्मा आज आप ऑफिस काफी जल्दी आ गई है?।" सिया ने घबराते हुए कहा — " सर जल्दी ऑफिस आने का कारण भी बहुत बड़ा है, हमें एक नया प्रोजेक्ट मिला है और वो प्रोजेक्ट हमे दो दिन में पूरा करना है।"अर्शित ने मुस्कुराते हुए कहा — " चिंता मत कीजिए मिस शर्मा हम साथ मिलकर काम करेंगे और ये प्रोजेक्ट जल्दी ही पूरा कर लेंगे और क्लाइंट को हमारा प्रोजेक्ट पसंद भी आएगा" .........तभी सिया ने घबराते हुए कहा— "लेकिन सर इतनी जल्दी ये सब होगा कैसे?""आप है न, मुझे आप पर पूरा भरोसा है आप अपना काम जल्दी ही पूरा करेंगी" —अर्शित ने हल्की सी आवाज में मुस्कुराते हुए कहा।सिया ने अर्शित की बात सुनी तो उसके भीतर एक अजीब-सी ताक़त आ गई।वह चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गई, लैपटॉप खोला और फाइलें एक-एक करके खोलने लगी। अर्शित भी अपने केबिन में जाकर काम में लग गयादो दिन का प्रोजेक्ट आसान नहीं था।कभी डेटा अधूरा निकल आता, तो कभी क्लाइंट की नई डिमांड सामने आ जाती। दोनों अंदर ही अंदर परेशान थे लेकिन एक दूसरे को देखकर अपनी हिम्मत को टूटने नहीं दिया। ऑफिस में देर रात तक लाइटें जलती रहीं। दोनों लगातार अपने अपने काम कर रहे थे अर्शित कभी सिया के पास आकर पूछता—“सब ठीक चल रहा है?”और सिया हर बार सिर हिलाकर कहती—“हाँ सर, बस थोड़ा वक्त चाहिए।” और फिर वो अपने केबिन में आकर काम में लग जाता था। देर रात, जब पूरा ऑफिस खाली हो चुका था, अर्शित की आँखें थकान से लाल हो गई थीं।स्क्रीन पर कोड धुंधला दिखने लगा।उसने चुपचाप चश्मा उतारकर आँखें मलीं। और काम करने लगा तभी सिया ने उसे देख लिया वो बिना कुछ बोले कॉफी लेकर अर्शित के पास गई और उसके टेबल पर रखा और कहा— " किसी ने मुझसे कहा था , कि इतनी देर तक काम करना ठीक नहीं है, कभी कभी खुद के लिए भी वक्त निकालना चाहिए" अर्शित ने हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया— " और किसी ने मुझसे कहा था, जिंदगी ने सिखाया है अगर ढील दी तो सब कुछ छीन जाता है।"उसने दुबारा कहा— "मिस शर्मा फिलहाल कुछ ऐसा ही है, अगर हमने थोड़ी सी भी लापरवाही की या काम में देरी हुई तो शायद ये प्रोजेक्ट हमारे हाथ से चला जाएगा, इसलिए कुछ भी हो हमे ये प्रोजेक्ट अच्छे से पूरा करना होगा।"" सर ये प्रोजेक्ट पूरा होगा और अच्छे से होगा लेकिन इस वक्त हमें एक छोटे से ब्रेक की जरूरत है वरना मेहनत भी जवाब देने लगेंगे।" — सिया ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया और फिर दिनों के बीच कॉफी के बहाने कुछ बातें हुई जिसके बाद दोनों वापस अपने अपने काम पर लग गए।
आगे की कहानी जानने के लिए हमे फॉलो जरूर करे😊