किसी को नहीं पता था—
कि संस्कृति सिर्फ इस घर से नहीं, अपनी ही बीमारी से भी लड़ रही थी।
संस्कृति को हेलुसिनेशन होते थे। और उसके साथ-साथ स्लीप पैरालिसिस।
ऐसी बीमारी जिसमें आँखें खुली रहती हैं,दिमाग जागता रहता है—
पर शरीर मर चुका-सा हो जाता है।शादी के बाद जब से कार्तिक हर रात उसके पास सोता था तब वो सुरक्षित थी।
क्योंकि उसे पता था अगर डर आएगा तो कोई उसे हिला देगा।
कोई कहेगा—
मैं यहीं हूँ।
काली कोठरी में अंधेरा और गहरा हो गया। सीलन की बदबू।
दीवारों से टपकती नमी।संस्कृति घुटनों में सिर छुपाकर रोती रही।
संस्कृति (सिसकते हुए) बोली -
कार्तिक जी…मुझे डर लग रहा है…।
लेकिन इस बार कोई जवाब नहीं आया। धीरे-धीरे उसके कानों में आवाज़ें गूँजने लगीं। जैसे कोई उसका नाम फुसफुसा रहा हो।
उसे लगा—
पीछे कोई खड़ा है। उसने मुड़कर देखना चाहा—
पर डर ने उसकी गर्दन जकड़ ली। उसे लगा कोई उसकी तरफ़ बढ़ रहा है। काले चेहरे। टेढ़ी उँगलियाँ। लाल आँखें। उसे hellosination हो रही थी।
संस्कृति (रोते हुए) बोली -
नहीं…प्लीज़…मुझे मत मारो…।
उसकी साँस तेज़ हो गई। सीना दबने लगा। रोते-रोते वो ज़मीन पर लेट गई। आँखें भीग चुकी थीं। और डर के साथ वो सो गई।
अचानक उसकी आँखें खुल गईं। पर वो हिल नहीं पा रही थी।
हाथ बेकार।
पैर बेकार।
गला जैसे किसी ने जकड़ लिया हो।
उसकी आँखों के सामने डरावनी आकृतियाँ उभरने लगीं। छत से कुछ उसकी तरफ़ झुक रहा था। कानों में चीख़ें। हँसी।
फुसफुसाहट—
तू यहीं मरेगी…
संस्कृति चिल्लाना चाहती थी—
पर आवाज़ गले में अटक गई। आँसू… पर आवाज़ नहीं
उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। दिल तेज़-तेज़ धड़क रहा था। उसे लगा अब वो मर जाएगी।
उसके दिमाग में बस एक नाम गूँज रहा था— कार्तिक जी।
संस्कृति (मन ही मन) बोली -
अगर आप यहाँ होते…तो मैं नहीं डरती…।
उसी वक्त हवेली में कहीं दूर—
कार्तिक बेचैन करवटें बदल रहा था। उसे अजीब-सी घबराहट हो रही थी। जैसे किसी ने उसका दिल भींच लिया हो।
कुछ देर बाद—
जैसे किसी ने संस्कृति के सीने से भारी पत्थर हटा दिया हो।
साँस थोड़ी सामान्य हुई। दिल अब भी तेज़ धड़क रहा था पर वो हिल पा रही थी। संस्कृति हड़बड़ाकर उठी। अंधेरे में दीवारों को टटोलती हुई दरवाज़े तक पहुँची।
और फिर—
धड़ाम! धड़ाम!
उसने पूरी ताक़त से दरवाज़ा पीटना शुरू किया।
संस्कृति (रोते–चीखते हुए) बोली -
माँ जी…
कार्तिक जी…
पापा जी…
प्लीज़ दरवाज़ा खोल दीजिए…
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
वो बोली -
मुझे बहुत डर लग रहा है…प्लीज़…
उसकी चीखें खामोश हवेली में गूँज उठीं। कार्तिक झटके से उठ बैठा। उसका दिल डूब गया।
कार्तिक (घबराकर) बोला -
संस्कृति—!
वो भागता हुआ सीढ़ियों की ओर बढ़ा—
पर बीच रास्ते में उसकी माँ आ खड़ी हुई।
सास (सख़्त आवाज़ में) बोली -
कहाँ जा रहा है?
कार्तिक (बेताब हुए) बोला -
माँ…वो डर गई है…मुझे जाने दीजिए—
सास बोली -
तू नहीं जाएगा।
उसके आगे बिना उसकी बात सुने सास आगे बढ़ गई। कार्तिक बस पीछे खड़ा रह गया।
क्लिक—
ताले की आवाज़।
दरवाज़ा खुलते ही संस्कृति ज़मीन पर बैठ गई। वो फूट-फूट कर रोने लगी। उसके होंठ काँप रहे थे। आँखें लाल।
संस्कृति (हिचकियों में) बोली -
मुझे मत छोड़िए…मुझे बहुत डर लगता है…।
सास का चेहरा पत्थर जैसा था।
सास (चिल्लाकर) बोली -
बस! बहुत हो गया तेरा नाटक!
वो झुककर संस्कृति के मुँह के पास आई।सास ने अपने हाथ में टेप ले रखा था । और उसने वो टेप संस्कृति के मुँह पर ज़ोर से चिपका दिया।
सास (दाँत भींचते हुए) बोली -
ए लड़की!
चुप कर!
ना खुद सोती है, ना हमें सोने देती है!
उसकी उँगली संस्कृति के चेहरे के पास लहराई—
वो बोली -
अबकी बार अगर एक भी आवाज़ आई—
तो इससे भी बुरी हालत करूँगी तेरी।
संस्कृति बस आँखों से आँसू बहा रही थी। आवाज़ अब उसके पास थी ही नहीं। सास पीछे हटी। दरवाज़ा फिर से बंद हुआ।
क्लिक—
ताला लग गया।
बाहर…कार्तिक स्तब्ध खड़ा था। उसने सब सुना। सब देखा। पर कुछ कर नहीं पाया। उसकी आँखों से पहली बार बेआवाज़ आँसू गिरे।
अंदर…संस्कृति दीवार से टेक लगाकर बैठ गई। टेप से ढँका मुँह।
खुली डरी हुई आँखें।
संस्कृति (मन ही मन) बोली -
शायद इस घर में प्यार ही नहीं…डर भी गुनाह है।
क्या कार्तिक अब भी चुप रह पाएगा?
या
आज ये खामोशी उसे तोड़ देगी?