इतिहास के पन्नों से 18
अल्बर्ट आइंस्टीन ने इजरायल के राष्ट्रपति का प्रस्ताव ठुकरा दिया - अल्बर्ट आइंस्टीन यहूदी मूल के विश्व विख्यात वैज्ञानिक थे . वे ‘ सापेक्षता के सिद्धांत ‘ ( Theory of Relativity ) के जनक थे और उन्हें भौतिक शास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था . 1952 में तत्कालीन इजरायली राष्ट्रपति चाइम वेइज़मैन के निधन होने पर उन्हें इजराइल के राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव मिला था जिसे आइंस्टीन ने नम्रता पूर्वक ठुकरा दिया था . यह प्रस्ताव तत्कालीन प्रधान मंत्री डेविड बेन गुरियन की तरफ से मिला था . आइंस्टीन का कहना था कि उन्हें इस क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं है इसलिए वे इस पद के योग्य नहीं हैं . वैसे इजरायल में वहां का प्रधान मंत्री ही सरकार का प्रमुख होता है और राष्ट्रपति औपचारिक कर्तव्य निभाते हैं . अल्बर्ट आइंस्टीन सदा यहूदी के पक्षधर रहे थे .
द मैड इब्राहिम - इब्राहिम प्रथम 1640 - 48 के दौरान ओटोमन साम्राज्य का सुल्तान था . उनकी मानसिक स्थिति के चलते उन्हें ‘ द मैड इब्राहिम ‘ कहा जाता था . कुछ इतिहासकारों के अनुसार उनकी मानसिक स्थिति ख़राब नहीं थी पर वे शासन कार्य में अक्षम थे .
कहा जाता है कि अपने हरम में मौजूद सैकड़ों पत्नियों को इब्राहिम ने मरवा दिया था . जनिसरी विद्रोह और धार्मिक मान्यताओं के चलते 1648 में उन्हें पदच्युत किया गया था . 18 अगस्त 1648 को उन्हें फांसी दे दी गयी .
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बम और गोले जो न फट सके थे - प्रथम विश्व युद्ध ( WWI ) 11 नवंबर 1918 को समाप्त हो गया था और द्वितीय विश्व युद्ध ( WW ) II 2 सितंबर 1945 को . विडंबना यह है कि आज प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त हुए 100 साल से भी ज्यादा हुए और द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के करीब 80 साल होने के बावजूद इन युद्धों में इस्तेमाल किये गए बिन फटे बम और गोले आज भी पाए जाते हैं . तत्कालीन लड़ाई के मैदान के अतिरिक्त खेतों आदि में ऐसे बमों के मिलने से हजारों किसान , बम निरोधक दस्ता के कार्यकर्ता और आम लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है .
ऐसे बमों की संख्या बताना संभव नहीं है पर एक अनुमान के अनुसार अकेले प्रथम विश्व युद्ध में लगभग 100 करोड़ शेल प्रयोग में लाये गए थे जिनमें करीब 30 %फट न सके थे . कुछ बमों को इकट्ठा कर ले जा कर एक साथ डिफ्यूज किया जाता है जबकि कुछ को स्थल पर ही डिफ्यूज करना अनिवार्य होता है . यूरोप के फ्रांस , बेल्जियम , जर्मनी आदि देशों में बिना फटे बम आज भी मिलते हैं . कहा जाता है कि ये कब तक मिलते रहेंगे कहना संभव नहीं है , हो सकता है सैकड़ों सालों तक यह सिलसिला जारी रहे .
इसी वर्ष 7 मार्च को WW II का एक बिना फटा बम पेरिस के अत्यंत व्यस्त गारे दु नॉर्ड ( Gare du nord ) स्टेशन पर पाया गया था . इस स्टेशन से ऑल यूरोस्टार इंटरनेशनल रेल सेवायें होती हैं जो ब्रिटेन , जर्मनी , बेल्जियम , इटली आदि देशों को जोड़ती है . इसके चलते बहुत ट्रेनों को रद्द करना पड़ा था .
पुनः इसी वर्ष जून के महीने में WW II के तीन बिन फटे बम जर्मनी के कोलोन ( Cologne ) शहर में एक निर्माणाधीन क्षेत्र में मिले थे . इनमें फ्यूज लगे थे इसलिए इन्हें हटाना सम्भव नहीं था . इन बमों को स्थल पर ही डिफ्यूज करना जरूरी था . इसलिए इन्हें निरस्त करने के पहले आसपास के घरों , दफ्तरों , अस्पताल आदि जगहों के करीब 20500 लोगों को हटाना पड़ा था .
मोहम्मद बिन तुगलक एक बुद्धिमान मूर्ख राजा -मोहम्मद बिन तुगलक मध्यकालीन भारत में 1324 - 1351 तक दिल्ली सल्तनत का एक सुल्तान था . अपनी समझ से वह योजनाएं अच्छी बनाता था पर उसका क्रियान्वयन ठीक तरह से नहीं करता था . इसलिए उसकी योजनाएं विफल होती थीं और उसका नाम ‘ बुद्धिमान मूर्ख ‘ पड़ा था .
तुगलक ने अपनी सल्तनत के विस्तार के लिए एक विशाल सेना रखी थी . सेना के रखरखाव पर होने वाले खर्च के लिए उसने किसानों से उनकी हैसियत से ज्यादा कर वसूलना शुरू किया . किसान तंग आकर अन्य धंधा अपनाने लगे जिससे अनाज की कमी हुई और अकाल पड़ा .
चांदी की कमी के चलते उसने तांबे की एक सांकेतिक मुद्रा चलाया जिसके चलते लोगों में अराजकता फ़ैल गयी . इस पर तुगलक ने लोगों को तांबे के सिक्के के बदले शाही खजाने से चांदी और सोने के सिक्के लौटाने का आदेश दिया था .
राजधानी का स्थानांतरण - तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से हटा कर दौलताबाद बनाया . इसके चलते सभी दरबारियों , कवियों , विद्वानों को दौलताबाद जाने का आदेश दिया . इस दौरान कुछ की मृत्यु भी हो गयी . इस बीच तुगलक ने राजधानी को पुनः वापस दिल्ली बदल दिया .
इन्हीं कारणों से तुगलक को ‘ बुद्धिमान मूर्ख ‘ कहा गया था .
1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शास्त्रीजी ने हर घर में गेहूं उगाने को कहा - 1965 में भारत के प्रधानमंत्री स्व लाल बहादुर शास्त्री थे . शास्त्रीजी कद के छोटे पर ठोस इरादे वाले ईमानदार व्यक्ति थे .
1965 में जहाँ एक तरफ पाकिस्तान से युद्ध चल रहा था और हमारी सेना दुश्मनों के दांत खट्टे कर रही थी दूसरी तरफ देश में अनाज का घोर संकट था ,देश अकाल से जूझ रहा था . देश को अमेरिका से PL 480 किस्म की गेहूं को आयात करना पड़ा था . यह एक रद्दी किस्म का गेहूं था जो वहां सूअर आदि जानवरों को दिया जाता था . यह भारत के लिए अपमानजनक बात थी .
ऐसे नाजुक स्थिति में शास्त्रीजी ने देशवासियों को सप्ताह में एक दिन एक समय का भोजन न कर अनाज बचाने का आह्वाहन किया था . इसके अतिरिक्त जहाँ भी सम्भव हो लोगों को अपने घरों में गेहूं उगाने के लिए प्रोत्साहित किया था . कहावत है न - चैरिटी बिगिंस एट होम , शास्त्रीजी ने अपने सरकारी आवास के प्रांगण में गेहूं की खेती शुरू की . इन दोनों तरीकों से देश में अनाज संकट में भले ही छोटी मात्रा में कमी आयी हो पर यह भारतीयों के लिए एक नैतिक जीत थी . इसी संकट को देखते हुए देश में अनाज की उपज बढ़ाने के लिए योजना बनी थी और हरित क्रांति की नींव रखी गयी .
क्रमशः