कुरुक्षेत्र का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। अठारह दिनों तक पृथ्वी ने जिस भयानक रक्तपात को देखा था, उसके बाद अब मैदान में केवल सन्नाटा था। टूटी रथों की ध्वनियाँ, बिखरे अस्त्र-शस्त्र, वीरों के निर्जीव शरीर और चारों ओर फैली धूल—मानो स्वयं समय भी ठहर गया हो। पांडव विजयी हुए थे, पर यह विजय उत्सव नहीं, एक भारी बोझ बनकर युधिष्ठिर के हृदय पर बैठ गई थी।
हस्तिनापुर की ओर लौटते समय युधिष्ठिर का मन शोक से भरा हुआ था। उनके सामने बार-बार वही दृश्य आ जाता—भीष्म पितामह बाणों की शैया पर लेटे हुए, द्रोणाचार्य का पतन, कर्ण का अंत, और अपने ही बंधु-बांधवों का संहार। वे सोचते, “क्या यह धर्मयुद्ध था? यदि था, तो मेरे हृदय में इतनी पीड़ा क्यों है? क्या मैं इस रक्तपात का भागी नहीं हूँ?”
एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि वे पितामह भीष्म के पास जाएंगे। भीष्म अभी भी शरशय्या पर लेटे थे, सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके शरीर को असंख्य बाणों ने भेद रखा था, पर उनके मुखमंडल पर अद्भुत शांति थी—मानो तपस्वी समाधि में लीन हो।
युधिष्ठिर अपने भाइयों, श्रीकृष्ण और ऋषियों के साथ वहाँ पहुँचे। दूर से ही उन्होंने देखा—सूर्य की किरणें भीष्म के श्वेत केशों पर पड़ रही थीं, और वे दिव्य आभा से प्रकाशित हो रहे थे।
युधिष्ठिर ने उनके चरणों में सिर झुका दिया। उनकी आँखों में आँसू थे।
“पितामह,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “मैं अपराधी हूँ। मेरे कारण यह महाविनाश हुआ। मुझे राज्य नहीं चाहिए। मैं वन को चला जाऊँगा। ऐसे पाप से भरे हाथों से मैं हस्तिनापुर का शासन कैसे करूँ?”
भीष्म ने करुणा भरी दृष्टि से युधिष्ठिर की ओर देखा। उनका स्वर मंद था, किंतु स्पष्ट—
“वत्स युधिष्ठिर, यह समय विषाद का नहीं, विवेक का है। युद्ध का निर्णय तुम्हारा अकेले का नहीं था। अधर्म का नाश होना ही था। यदि तुम धर्म के मार्ग पर चलकर भी स्वयं को दोषी मानोगे, तो प्रजा का कल्याण कैसे करोगे?”
युधिष्ठिर ने कहा, “पितामह, धर्म क्या है? मैं जीवन भर धर्म का पालन करता रहा, फिर भी यह विनाश हुआ। क्या यही धर्म है?”
भीष्म मुस्कराए। “धर्म सूक्ष्म है, पुत्र। वह केवल बाहरी कर्मों में नहीं, बल्कि अंतःकरण की भावना में निवास करता है। शांति पर्व का सार यही है कि राजा को धर्म को समझकर शासन करना चाहिए, न कि केवल परंपरा के आधार पर।”
चारों ओर ऋषि-मुनि एकत्र थे—व्यास, नारद, देवर्षि, सभी मौन होकर उस महान संवाद को सुनने को उत्सुक थे।
भीष्म बोले, “राजधर्म सबसे कठिन धर्म है। राजा का जीवन उसका अपना नहीं होता; वह प्रजा का होता है। जैसे वर्षा का जल सबके लिए समान होता है, वैसे ही राजा का न्याय भी निष्पक्ष होना चाहिए। उसे न मित्र से मोह होना चाहिए, न शत्रु से द्वेष।”
युधिष्ठिर ने पूछा, “परंतु पितामह, यदि राजा स्वयं दुखी हो, अपराधबोध से भरा हो, तो क्या वह न्याय कर सकता है?”
भीष्म ने उत्तर दिया, “यही परीक्षा है। राजा का हृदय करुणामय होना चाहिए, परंतु निर्णय बुद्धि से लेना चाहिए। यदि करुणा के कारण वह अपराधी को दंड न दे, तो निर्दोषों पर अन्याय होगा। और यदि क्रोध के कारण वह कठोर हो जाए, तो प्रजा भयभीत हो जाएगी। संतुलन ही राजधर्म है।”
श्रीकृष्ण मौन मुस्कुरा रहे थे। वे जानते थे कि यह संवाद केवल युधिष्ठिर के लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए भी था।
भीष्म ने आगे कहा, “राजा को सदैव सत्य बोलना चाहिए। परंतु ऐसा सत्य जो प्रजा का हित करे। कठोर वचन, चाहे सत्य हो, यदि वह अनावश्यक पीड़ा दे, तो उसे बोलना उचित नहीं। वाणी में मधुरता और न्याय में दृढ़ता—यही राजधर्म का मूल है।”
युधिष्ठिर ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। उनका मन धीरे-धीरे स्थिर हो रहा था।
“पितामह,” उन्होंने पूछा, “राजा को अपने मंत्रियों और सहयोगियों का चयन कैसे करना चाहिए?”
भीष्म ने उत्तर दिया, “मंत्री वे हों जो विद्वान, सत्यवादी और निडर हों। जो राजा की हाँ में हाँ न मिलाएँ, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसका विरोध भी कर सकें। चापलूस राज्य को भीतर से खोखला कर देते हैं। जैसे दीमक लकड़ी को खा जाती है, वैसे ही चाटुकार राज्य का नाश कर देते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “राजा को अपने इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए। लोभ, क्रोध, काम और अहंकार—ये चार शत्रु राज्य को नष्ट कर देते हैं। जो राजा विषय-वासनाओं में लिप्त हो जाता है, उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, और वह प्रजा का हित भूल जाता है।”
युधिष्ठिर ने सिर झुका लिया। उन्हें लगा कि पितामह उनके मन का बोझ हल्का कर रहे हैं।
भीष्म ने शांति पर्व के अंतर्गत मोक्षधर्म की भी चर्चा की। “राजा चाहे कितना भी महान हो, अंततः वह भी नश्वर है। इसलिए उसे यह स्मरण रखना चाहिए कि सत्ता स्थायी नहीं है। जो राजा अहंकार में डूब जाता है, उसका पतन निश्चित है। पर जो स्वयं को ईश्वर का सेवक मानकर शासन करता है, उसका यश अमर होता है।”
एक क्षण के लिए भीष्म ने आँखें बंद कीं। उनके शरीर में पीड़ा थी, पर आत्मा दृढ़ थी।
“युधिष्ठिर,” उन्होंने कहा, “धर्म का मूल करुणा है। प्रजा को पुत्रवत समझो। उनकी रक्षा करो, उनका पालन करो। जैसे पिता अपने बच्चों के लिए जागता है, वैसे ही राजा को भी जागरूक रहना चाहिए।”
युधिष्ठिर की आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार वे शोक के नहीं, कृतज्ञता के थे।
उन्होंने पूछा, “यदि कभी राजा को धर्म और लाभ में से किसी एक को चुनना पड़े, तो क्या करना चाहिए?”
भीष्म ने दृढ़ स्वर में कहा, “धर्म को चुनो। लाभ क्षणिक है, धर्म शाश्वत। अधर्म से प्राप्त राज्य टिकता नहीं। धर्म से मिली छोटी भूमि भी स्वर्ग समान होती है।”
सूर्य पश्चिम की ओर ढल रहा था। पर संवाद की ज्योति बढ़ती जा रही थी।
भीष्म ने दानधर्म, आपद्धर्म और नीतिशास्त्र पर भी विस्तार से उपदेश दिया। उन्होंने कहा, “आपत्ति के समय नियमों में लचीलापन हो सकता है, पर मूल उद्देश्य प्रजा की रक्षा होना चाहिए। जैसे नाविक तूफान में दिशा बदल सकता है, पर लक्ष्य तट ही रहता है।”
उन्होंने यह भी कहा, “क्षमा महान गुण है, परंतु जहाँ क्षमा से अधर्म बढ़े, वहाँ दंड आवश्यक है। दंड ही व्यवस्था का आधार है।”
युधिष्ठिर ने अनुभव किया कि उनके भीतर का संशय धीरे-धीरे मिट रहा है। उन्हें लगा कि पितामह केवल उपदेश नहीं दे रहे, बल्कि उन्हें राजा बनने की दीक्षा दे रहे हैं।
अंत में भीष्म ने कहा, “वत्स, तुम्हें राज्य इसलिए मिला है कि तुम धर्म की स्थापना करो। तुम्हारा शोक तुम्हारी संवेदनशीलता का प्रमाण है, पर अब उसे त्यागकर कर्तव्य का पालन करो। यही तुम्हारा प्रायश्चित है।”
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर की ओर देखा और कहा, “धर्मराज, पितामह के वचनों में ही तुम्हारे प्रश्नों का समाधान है।”
युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा, “पितामह, आपके उपदेश मेरे लिए अमृत के समान हैं। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपके बताए मार्ग पर चलकर राज्य करूँगा।”
भीष्म के मुख पर संतोष की झलक आई। “तब मैं निश्चिंत हूँ,” उन्होंने कहा। “हस्तिनापुर सुरक्षित है।”
दिन बीतते गए। युधिष्ठिर प्रतिदिन पितामह के पास जाकर उनसे धर्म, नीति और जीवन के रहस्यों पर प्रश्न करते। शांति पर्व के वे उपदेश महाभारत का अमूल्य रत्न बन गए।
जब सूर्य उत्तरायण हुआ, भीष्म ने अंतिम बार सभी को देखा। उन्होंने श्रीकृष्ण का ध्यान किया और कहा, “अब मेरा समय पूर्ण हुआ।”
युधिष्ठिर की आँखें भर आईं। उन्होंने पितामह के चरणों में प्रणाम किया।
भीष्म ने अंतिम वचन कहा, “धर्म ही जीवन का आधार है। उसे कभी मत छोड़ना।”
और फिर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। आकाश में मानो एक दिव्य प्रकाश फैल गया।
युधिष्ठिर उस दिन हस्तिनापुर लौटे तो उनके कदमों में दृढ़ता थी। उनके हृदय में शोक था, पर साथ ही एक नई जिम्मेदारी का बोध भी। उन्होंने पितामह के उपदेशों को अपने शासन का आधार बनाया।
कालांतर में युधिष्ठिर का राज्य धर्म, न्याय और शांति के लिए प्रसिद्ध हुआ। लोग कहते थे—“धर्मराज के राज्य में अन्याय का स्थान नहीं।”
शांति पर्व का वह संवाद केवल एक राजा और उसके पितामह के बीच का वार्तालाप नहीं था; वह मानव जीवन के लिए मार्गदर्शन था। उसने सिखाया कि सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण है सेवा, और विजय से अधिक महान है धर्म।
कुरुक्षेत्र का रक्तरंजित मैदान अंततः शांति का प्रतीक बन गया, क्योंकि वहाँ से निकला था—धर्म का वह प्रकाश, जिसने युगों तक मानवता को दिशा दी।