इन्द्रप्रस्थ की सभा उस दिन विशेष रूप से सजी हुई थी। राजसूय यज्ञ के बाद पांडवों का यश चारों दिशाओं में फैल चुका था। राजमहल के प्रांगण में सुवर्ण स्तंभ चमक रहे थे, सुगंधित धूप की महक वातावरण को पवित्र बना रही थी, और सभा में विद्वान ब्राह्मण, वीर योद्धा तथा मंत्रीगण विराजमान थे। परंतु उस वैभव के बीच धर्मराज युधिष्ठिर के हृदय में एक सूक्ष्म चिंता थी।
राज्य विस्तार पा रहा था, प्रजा सुखी थी, किन्तु युधिष्ठिर जानते थे कि केवल वैभव ही आदर्श शासन का प्रमाण नहीं होता। राजा का धर्म केवल कर संग्रह और शत्रु-विजय तक सीमित नहीं है; वह तो प्रजा के हृदय की शांति में निहित है।
उसी समय सभा के द्वार पर वीणा की मधुर ध्वनि गूँजी। सभी ने देखा—देवर्षि नारद अपने दिव्य तेज के साथ सभा में प्रवेश कर रहे हैं। उनके चरणों की आहट मानो ज्ञान का संदेश लेकर आई हो।
युधिष्ठिर तुरंत सिंहासन से उतर आए और हाथ जोड़कर बोले, “देवर्षि, आपके आगमन से हमारा राज्य धन्य हुआ। कृपया आसन ग्रहण करें।”
नारद मुस्कुराए। उनकी आँखों में करुणा और विवेक का अद्भुत मिश्रण था। वे आसन पर बैठे और बोले, “राजन, तुम्हारा यश स्वर्ग तक पहुँच रहा है। परंतु यश स्थायी तभी होता है जब उसके मूल में धर्म हो। इसलिए मैं तुमसे कुछ प्रश्न पूछने आया हूँ।”
सभा में सन्नाटा छा गया।
नारद ने गंभीर स्वर में पूछा, “राजन, क्या तुम प्रातःकाल उठकर राज्य के कार्यों पर विचार करते हो? क्या तुम्हारे मंत्री विद्वान और निष्ठावान हैं? क्या तुम्हारे राज्य में न्याय बिना पक्षपात के दिया जाता है?”
युधिष्ठिर ने विनम्रता से उत्तर दिया, “देवर्षि, मैं प्रयास करता हूँ कि प्रत्येक निर्णय धर्म के अनुरूप हो। परंतु मैं स्वयं को पूर्ण नहीं मानता। कृपया मार्गदर्शन दें।”
नारद ने कहा, “राजधर्म अत्यंत सूक्ष्म है। राजा का मन यदि विषयों में लिप्त हो जाए, तो राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ता है। क्या तुम अपने इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हो?”
युधिष्ठिर ने कहा, “मैं संयम रखने का प्रयत्न करता हूँ, परंतु मानव होने के कारण कभी-कभी द्वंद्व उत्पन्न होता है।”
नारद ने गंभीरता से कहा, “यही तो परीक्षा है, राजन। राजा का जीवन व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं होता। यदि वह विलास में डूब जाए, तो प्रजा भी अनुशासन खो देती है। राजा जैसा आचरण करता है, प्रजा उसका अनुसरण करती है।”
भीम और अर्जुन ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। वे जानते थे कि यह संवाद केवल युधिष्ठिर के लिए नहीं, समस्त शासन व्यवस्था के लिए है।
नारद ने आगे पूछा, “क्या तुम्हारे राज्य में किसान सुरक्षित हैं? क्या उनके खेतों तक जल पहुँचता है? क्या व्यापारी निर्भय होकर व्यापार कर सकते हैं? क्या न्यायालयों में निर्णय शीघ्र और निष्पक्ष होते हैं?”
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हमने नदियों पर बाँध बनवाए हैं, मार्गों की रक्षा के लिए सैनिक नियुक्त किए हैं, और न्याय के लिए योग्य विद्वानों को दायित्व सौंपा है। फिर भी मैं चाहता हूँ कि राज्य और अधिक आदर्श बने।”
नारद ने संतोषपूर्वक सिर हिलाया। “राजन, आदर्श शासन केवल बाहरी व्यवस्थाओं से नहीं बनता। उसका मूल है—नैतिकता। मंत्री ऐसे हों जो तुम्हें सत्य बताने का साहस रखें। यदि वे केवल प्रसन्न करने के लिए मधुर वचन बोलें, तो राज्य का पतन निश्चित है।”
सभा में बैठे कुछ मंत्री यह सुनकर गंभीर हो गए।
नारद ने कहा, “क्या तुम गुप्त रूप से भी प्रजा की स्थिति का निरीक्षण करते हो? क्या तुम्हें ज्ञात है कि दूर-दराज के गाँवों में क्या हो रहा है?”
युधिष्ठिर ने स्वीकार किया, “मैंने गुप्तचर नियुक्त किए हैं, परंतु स्वयं जाना कम ही हो पाता है।”
नारद बोले, “राजा को समय-समय पर स्वयं प्रजा के बीच जाना चाहिए। जब प्रजा देखती है कि उनका राजा उनके दुःख-सुख में सहभागी है, तब उनका विश्वास दृढ़ होता है।”
उन्होंने आगे कहा, “धन का संचय राज्य के लिए आवश्यक है, परंतु अत्यधिक कर प्रजा को कष्ट देता है। जैसे मधुमक्खी फूल से मधु लेती है पर फूल को नष्ट नहीं करती, वैसे ही राजा को कर लेना चाहिए।”
युधिष्ठिर के मन में यह उपमा अंकित हो गई।
नारद ने अगला प्रश्न किया, “क्या तुमने यह सुनिश्चित किया है कि सेना सशक्त हो, परंतु युद्ध केवल अंतिम उपाय हो?”
अर्जुन ने उत्तर दिया, “देवर्षि, हमारी सेना सुदृढ़ है, परंतु हम बिना कारण युद्ध नहीं करते।”
नारद ने कहा, “यही आदर्श है। युद्ध में वीरता है, पर शांति में महानता।”
फिर उन्होंने युधिष्ठिर की ओर देखकर कहा, “राजन, राजा को छह शत्रुओं से सावधान रहना चाहिए—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर। यदि ये मन में प्रवेश कर जाएँ, तो निर्णय दूषित हो जाते हैं।”
युधिष्ठिर ने गंभीरता से कहा, “देवर्षि, मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि इन शत्रुओं पर विजय पाने का सतत प्रयास करूँगा।”
नारद ने मुस्कुराकर कहा, “प्रयास ही पर्याप्त नहीं; सतर्कता भी आवश्यक है। तुम्हारे आसपास ऐसे लोग हों जो तुम्हें तुम्हारी भूलें बताने का साहस रखें।”
सभा में व्यास और अन्य ऋषि भी उपस्थित थे। वे इस संवाद को आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान का भंडार मान रहे थे।
नारद ने आगे कहा, “राजा को दानशील होना चाहिए, परंतु विवेक के साथ। अयोग्य को दिया गया दान अधर्म है। योग्य को सम्मान और सहायता देना ही सच्चा दान है।”
उन्होंने शिक्षा और धर्म की भी चर्चा की। “गुरुकुलों को संरक्षण दो, विद्वानों का सम्मान करो। जब ज्ञान का प्रकाश राज्य में फैलता है, तब अपराध और अज्ञान स्वतः कम हो जाते हैं।”
युधिष्ठिर ने पूछा, “देवर्षि, यदि कभी न्याय और करुणा में टकराव हो, तो क्या करना चाहिए?”
नारद ने उत्तर दिया, “करुणा के बिना न्याय कठोर हो जाता है, और न्याय के बिना करुणा दुर्बल। दोनों का संतुलन ही राजधर्म है। अपराधी को दंड दो, परंतु सुधार का अवसर भी दो।”
सभा में उपस्थित सभी लोग इस गहन संवाद से प्रभावित थे।
नारद ने अंतिम प्रश्न किया, “राजन, क्या तुम प्रतिदिन आत्मचिंतन करते हो? क्या तुम स्वयं से पूछते हो कि आज मैंने किसका भला किया और किसका अहित?”
युधिष्ठिर ने विनम्र स्वर में कहा, “देवर्षि, आज से यह मेरा नियम होगा।”
नारद खड़े हुए। उनकी वीणा की ध्वनि पुनः गूँज उठी। उन्होंने कहा, “राजन, तुम्हारे भीतर धर्म है, इसलिए तुम्हारा राज्य सुरक्षित है। पर स्मरण रखो—धर्म स्थिर नहीं रहता; उसे प्रतिदिन साधना पड़ता है।”
युधिष्ठिर ने उनके चरणों में प्रणाम किया। “आपका यह उपदेश मेरे लिए दीपक के समान है। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपके बताए मार्ग पर चलूँगा।”
नारद ने आशीर्वाद दिया, “तुम्हारा राज्य आदर्श बने, जहाँ न्याय हो, समृद्धि हो और शांति हो।”
देवर्षि के प्रस्थान के बाद भी सभा में गहरा मौन था। युधिष्ठिर ने अपने मंत्रियों की ओर देखा और कहा, “आज से हम शासन को और अधिक पारदर्शी और न्यायपूर्ण बनाएँगे। प्रत्येक निर्णय से पहले हम प्रजा के हित पर विचार करेंगे।”
भीम ने कहा, “भैया, हम आपके साथ हैं।”
अर्जुन ने जोड़ा, “राज्य की रक्षा और धर्म की स्थापना हमारा कर्तव्य है।”
उस दिन से इन्द्रप्रस्थ में नई व्यवस्था आरंभ हुई। युधिष्ठिर समय-समय पर वेश बदलकर प्रजा के बीच जाते। उन्होंने करों में संतुलन रखा, शिक्षा और कृषि को प्रोत्साहन दिया, और न्यायालयों को अधिक सुदृढ़ बनाया।
धीरे-धीरे इन्द्रप्रस्थ आदर्श शासन का प्रतीक बन गया। लोग कहते थे, “यहाँ राजा केवल सिंहासन पर नहीं बैठता, बल्कि हमारे हृदयों में निवास करता है।”
नारद–युधिष्ठिर संवाद केवल प्रश्नोत्तर नहीं था; वह शासन की आत्मा का उद्घाटन था। उसने सिखाया कि सत्ता का वास्तविक उद्देश्य सेवा है, और राजा का वास्तविक बल उसकी प्रजा का विश्वास।
समय बीतता गया, पर वह संवाद युगों तक गूँजता रहा—यह स्मरण कराते हुए कि राजधर्म केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि न्याय, करुणा और आत्मसंयम का समन्वय है। और जब तक शासक इन गुणों को धारण करता है, तब तक राज्य में शांति और समृद्धि बनी रहती है।